अर्चिरादि-द्वितीय प्रकरणम्

 

 वह मुमुक्षु ज्ञानी शरणागत जीवात्मा प्रथम अर्चि: अर्थात् अग्निलोक में जाता है। उस लोक का अधिपति देव (अर्चिरभिमानी देव) कुछ दूर तक अर्थात् उसके अपने लोक की ऊपरी भाग की सीमा पर्यन्त उसे पहुंचा देता है।

इसके बाद क्रमश: दिनाभिमानी देव, शुक्ल पक्षाभिमानी देवता, उत्तरायणभिमानी देव, सम्वत्सराभिमानी देवताओं के लोक में जाकर वायुदेव के लोक में जाता है और वह अपने लोक की ऊपर स्थित सीमा तक समादर पूर्वक पहुँचा देता है।

बाद में

प्रविश्य च सहस्रांशुम्’‘ सूर्य के मध्य में प्रविष्ट होकर-

इस कथन के अनुसार कालचक्र प्रवर्तक, हिरण्मयरथयुक्त सूर्य के सम्मुख असीम तेजोमय होकर दर्शन के अयोग्य अन्य दूसरे एक सूर्य रूप से जाकर उस सूर्यमंडलका भेदनकर उसकी ऊपरी सीमाके निकट पहुँच कर

क्रमाच्चन्द्रमसं प्राप्य’ क्रमश: चन्द्रमा के लोक में जाकर‘ –

इस उक्ति के अनुसार वह महात्मा (जीव) ग्रह, नक्षत्र और तारागणों का निर्वाहक अमृतमय चन्द्रमंडल में उपस्थित होता है। उस समय चन्द्रदेव उस जीव का अत्यन्त आदर व सत्कार करते हैं। चन्द्रमंडल से आगे चलकर ऊपर की ओर ‘अमानव’ पुरुष नामक नारायण के निकट उपस्थित प्रकार ऐसे ब्रह्माण्डों के सात आवरणों क्रमश: भेदन कर उनके बाहरी भाग में चारों ओर सीमा रहित मूल प्रकृति होता है। वह उस मुमुक्षु जीव को दिव्य मार्ग में पहुँचा देता है।

इसके बाद सबकी तृप्ति करने वाले जल का अधिपति वरुण देवता त्रैलोक्य के पालक इन्द्र एवं मुक्त जीवों के पास क्रमश: उपस्थित होने पर वे सब उस मुक्तात्मा की सत्कारपूर्वक अत्यन्त प्रशंसा करते हैं । तदन्तर वे देव, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस प्रभृति के निर्वाहक प्रजापति ब्रह्मा के लोक में जाकर उनके सम्पूर्ण लोकों का एक के बाद एक का अतिक्रमण करके सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एवं प्रथम आवरण से दश गुना बड़ा द्वितीय आवरण इस प्रकार ऐसे ब्रह्माण्डों के सात आवरणों को क्रमशः भेदन कर उनके बाहरी भाग के चारों ओर सीमा रहित मूल प्रकृति में उपस्थित होकर, उस मूल प्रकृति को भी अतिक्रमण कर उसकी ऊपरी सीमा पर पहुँच जाता है मुक्तात्मा ।

(इसके बाद श्रीलोकाचार्य स्वामी नरक के मार्ग के साथ तुलना करने के लिये संक्षेप में नरक के मार्ग का वर्णन करते है)|

 “इसके पहिले संसारी रूप में बद्ध होकर रहते समय अन्धकार से आवृत, जल और छाया से रहित, है महादेव,  केवल सुनने मात्र से भयभीत हो गयी” इस उक्ति के अनुसार सुनने से ही भय उत्पन्न करने वाले कम्प पैदा करने वाले (नरकों के) क्रूर मार्ग, यमदूतों के पाश एवं स्त्री-पुत्र रूपी पाशों के द्वारा आबद्ध होने पर यमदूतगण उसे खींचकर ले गये, बहुत से कुत्तों के दल ने आकर जंघा का मांस खाया, यमदूतों ने शक्ति, शंकु, तोमर, बाण आदि अस्त्र-शस्त्रों के द्वारा प्रहार किये, व्याघ्र, यमदूत और राक्षसों के मुख का आहार बनना पड़ा। सभी अंगों में मेघ, रक्तधारा बहती थी। क्षुधा तृष्णा से व्याकुल होकर यमदूतों के पास अन्न और जल की प्रार्थना करने पर उन्होंने मुख, नाक, ओठ, दाँत एवं हाथ पैर तोड़ दिये-इस प्रकार चीत्कार कर उसी मार्ग पर जाते समय जितना दुःख हुआ था।

इस समय उसके विपरीत वह समस्त दुःख जिससे नष्ट जाए, ऐसे सुखदायक मार्ग पर जाते समय अर्चिरादि मार्ग में आगमन का आरम्भ होने पर दर्शक रूप से स्थित गली-दिकयों का देवगण उस मुमुक्षु जीव का अत्यन्त सत्कार करते हैं। हमारे सर्वविध उपाय, अर्चिरादि मार्ग के पाथेय रूप एवं त्रिलोकी को अतिक्रमण करने वाले वामन भगवान के चरणकमल जिस शीघ्रता से ब्रह्मलोक में जाकर उपस्थित हुए ये मुमुक्षु महात्मा भी इतनी शीघ्र गति से चल पाते हैं। सिंह-व्याघ्र आदि जंगली जानवर किस प्रकार अपने आवास से निकलते हैं, उसी प्रकार वह महात्मा भी शब्दादि विषयों का अतिक्रमण कर संसाररूपी महागुल्म से निकल कर संसार के त्रिताप रूप दावाग्नि के बीच में पड़े रहने से होने वाले समस्त क्लेशों से निवृत्त होते है।

इसके बाद

‘स आगच्छति विरजां नदीम्’

उपनिषद् की इस उक्ति के अनुसार नरक की वैतरणी नदी के विपरीत अमृतप्रवाहिनी वैकुण्ठ की अप्राकृत दिव्य विरजा नदी के तट पर उस जीवात्मा के उपस्थित होते ही कीचड़ की रेखा के समान, दृढ़रूपसे लगी हुई एवं धूलि के कणों के समान सूक्ष्मरूप से स्थित वासना पूर्ण रूप से प्रक्षालित हो जाती है। मेघ से आवृत सूर्यमण्डल, राहु से ग्राम चन्द्रमण्डल अथवा कीचड़ में पड़ी मणि के समान मलिन देह में अवस्थित रहने से उस महात्मा का यथार्थ विशुद्ध आत्मस्वरूप अनादिकाल से अप्रकाशित था। उस समय

तत् तोयस्पर्शमात्रेण‘-

उस विरजा के जल का स्पर्श करने मात्र से जो सूक्ष्म शरीर उसका विरजा नदी तक गया था और जो आत्मा के निर्मल यथार्थ स्वरूप का आच्छादक था वह प्राकृत सूक्ष्म शरीर भी नष्ट हो जाता है एवं उसी क्षण ‘सूर्यकोटिप्रतीकाशः” उक्ति के अनुसार जैसे आकाश में एक ही समय में कई हजार सूर्यों के उदय के होने से जैसा जितना प्रकाश होता है वैसा असीम तेजोमय होकर ‘अमानवं समासाद्य” अमानव के निकट जाकर इस उक्ति के अनुसार वह मुक्तात्मा विरजा नदी के उस पार विराजमान चतुर्भुज शंख चक्रधारी नारायण (अमानव) के समीप उपस्थित होता है। उस समय अमानव नामक भगवान् उस मुक्तात्मा महात्मा को अपने हस्तकमल से स्पर्श करके तब उसे लावण्य, सौन्दर्य आदि कल्याण गुणों से युक्त शुद्ध सत्वमय भगवान के अनुभव का परिकर रूप अप्राकृत दिव्य विग्रह प्राप्त होता है। यह प्राप्त विग्रह (शरीर) इन्द्रादि देवताओं के समान तपस्या से प्राप्त नश्वर और त्रिगुणात्मक विग्रह नहीं है किन्तु भगवत्प्रेम के द्वारा प्राप्त नित्य और शुद्ध सत्वमय विग्रह है| इस विग्रहमें रहकर वह मुक्तजीव ‘यहाँ सुख कुछ भी नहीं’ इस उक्ति के विपरीत असीम आनन्द देने वाला, अद्वितीय अनोखा देश, अन्धकारावह, विशाल लीलाविभूति से विलक्षण विशद रुप से प्रकाशमान, सनकादि ब्रह्मर्षियो  के ध्यान से भी दूर रहने वाला, भगवान के अनुकूल रहना ही जिनका एकमात्र भोग है, ऐसे नित्यसिद्ध पार्षदों से परिपूर्ण और उन नित्यसिद्ध पार्षदों के द्वारा भी जिसकी सीमा का निर्देश एवं वर्णन के अयोग्य ऐसे ऐश्वर्य और स्वभावसे युक्त श्रीदिव्यदेश श्रीवैकुण्ठ के वहीं रहकर नेत्रों के द्वारा तृप्ति पर्यन्त दर्शन करके ‘आकाशं प्रणम्य‘-ऐसे वैकुण्ठ नामक परमाकाश को प्रणाम करता है।

अमानव भगवान के पास शंख, काहली, भेरी आदिक वाद्यों की ध्वनि सुनकर कोई दौड़कर आते हैं, कोई मार्ग में ठोकर खा रहा है, काई दूसरे से पूछ रहा है कि “कौनआ रहा है”, “हमारा उपकारक कहाँ है” इस प्रकार कह रहे हैं। “नेत्रों को आनन्द देने वाले को देख लिया, देख लिया”, “सभी भक्तगण दर्शन करने आइये, आइये” इस प्रकार बोलते हैं।

इस प्रकार महान् कोलाहल कर दल के दल नित्यमुक्त जीव अपने-अपने स्थान से निकल कर आते हुए नित्य पार्षदों की आनन्ददायक मधुर ध्वनि सुनकर अपने मन में ही अनुभव कर अत्यन्त प्रेमयुक्त हो श्री वैकुंठनाथ भगवान के समीप जाते समय

तं पंचशतान्यप्सरसां प्रतिधावन्ति‘  ‘तत्रत्य च ते देवा: साध्याश्च विमलाशया:

पाँच सौ अप्सराओं का समूह उस मुक्तात्मा के निकट जाता है,

उपनिषद् की इस उक्ति के अनुसार वे देवगण एवं विशुद्धान्त:करण साध्य नामक देववृन्द उसी स्थान पर आकर इस युक्ति के अनुसार दिव्यमाला, दिव्यअंजन दिव्य चूर्ण,दिव्यवस्त्र, आवरण आदि अपने हाथों में लिये पाँच सौ अप्सरायें एवं अन्य पार्षद उसके सन्मुख आकर

ब्रह्मालंकारेण अलंकुर्वन्ति’-परब्रह्म के अलंकारों से उसे सुशोभित कर देते हैं।

उपनिषद् की इस उक्ति के अनुसार भगवान के द्वारा धारण किये, अतएव उनकी प्रसादी स्वरूप दिव्यवस्त्र, आभूषण, अंगराग आदि के द्वारा अलंकृत उसे (मुक्तात्मा) को देखकर अहा, इनके अलंकार कितने सुन्दर सुन्दर हैं, वस्त्रों की कैसी सुन्दर शोभा है,द्रष्टि कितनी सुन्दर दिखाई दे रही है-यह कहते हुए वे पार्षदगण आशचर्यचकित हो उस मुक्तात्मा जीवकी प्रशंसा करते हैं।

इसके बाद श्रीगरुड़जी हजारों पताकाओं, मोतियों की मालाओं और दिव्यवितान (चँदोवा) से अलंकृत, दिव्य परिचारिकाओं से घिरे हुये एवं भगवान के संकल्प से रचित दिव्य विमान को ले आते हैं। इस विमान में उस मुक्तात्मा को बैठाकर उसकी स्तुति करते करते सब तिल्यकान्तार नामक स्थान के समीप जाते हैं। वहाँ अन्य अनेक अप्सरायें अपने हाथों में नाना प्रकार के उपहार (भेंट सामग्री) लेकर उस जीव की स्तुति और सत्कार करती हैं। इसके बाद तिल्यगन्ध, ब्रह्मगन्ध आदिक नाना प्रकार की दिव्यगन्धों को सूँघता हुआ वह मुक्तजीव सर्वगन्ध हो जाता है (उपनिषदों में भगवान् को सर्वगन्ध, सर्वरस कहा गया है)

तब ‘पताकाओं से अलंकृत काव्य गोपुरम पास आते हैं।’ इस उक्ति के अनुसार वह ध्वजा, पताकाओं से अलंकृत दिव्य गोपुर के निकट उपस्थित होने पर वहाँ के यो श्रीद्वारपालगण अत्यन्त आदर पूर्वक उस जीव का सत्कार करते हैं। यहां से आगे बढ़कर ‘समतीत्य जनाकुलं’ ‘कपाटमतीत्य गत्वा’ अतिक्रमण करके मार्ग में चलने वाले मनुष्यों से परिपूर्ण द्वार को पार करके। रामायण की इस

 

उक्ति के अनुसार वह मुक्त जीव मन और नेत्रों को आकर्षण करके आयोध्या-अपराजिता इन नामों से कहे जाने वाले श्रीवैकुण्ठ दिव्य नगर में किसी प्रकार सौभाग्य  से प्रवेश करके ‘श्रीवैकुण्ठायदिव्यनगराय नमः’ यह कहकर श्रीकृष्ण के परमाकाश श्रीवैकुण्ठनगर को प्रणाम करता है। समुद्र जल सह्यपर्वत की चोटी पर चढ़ने पर जैसे सब उसे एक आश्चर्य की घटना मानते, सोचते हैं। उसी प्रकार तब श्री वैकुण्ठ में स्थित अमर एवं मुनिगण एक अनादिकालसे संसार में आबद्ध जीव के वैकुण्ठ में आगमन को एक असम्भव सी घटना मानकर आश्चर्यचकित होकर उसकी प्रशंसा करते हैं। इसके बाद गरुड, विष्वक्सेन आदिक प्रधान-प्रधान पार्षदगण उस मुक्तजीव को अपने अपने घर ले जाकर उच्च आसन पर बैठाकर उनकी अपनी दिव्यदेवियों द्वारा लाये गये जल से उस मुक्तात्मा के चरण धोते हैं। उस चरणामृत का प्रभाव बताते हुए उसे अपनी पत्नियों को देकर वे सब सत्कार के क्रमानुसार उसका सत्कार करते हैं।

१-वैकुण्ठ में जो भगवान के दर्शन और अनुभव में आबद्ध न रहकर सब समय सेवा में ही निरत रहते हैं उन्हें अमर एवं जो अपना भक्ति की अधिकता के कारण शरीर को शिथिल होना और अपने को जो संभाल नहीं पाते केवल भगवान के दर्शन उनके दिव्य गुणों के अनुभव में निम्न रहते हैं वे मनि कहते हैं। केवल भिन्न स्वभाव के कारण ये दो श्रेणी कही गई वैसे सब एक ही श्रेणी के हैं।

देशान्तर से आये पुत्र को उसकी माता जैसे अत्यन्त स्नेह पूर्वक देखती ही रहती है। उसी प्रकार जैसे चन्द्रमा के समान आनन्दजनक और शीतल मुखवाली दिव्य स्त्रीगण हाथों में श्रीशठारी (भगवान की पादुका) दिव्यचूर्ण,पूर्णकुम्भ, मंगलदीप आदि द्रव्य लेकर उस मुक्तजीव कीअगवानी करने आती हैं। इसके बाद वह जीव विशाल राजमार्ग पर सैकड़ों दिव्य आवरणों के द्वारा आवृत्त एवं अग्नि में तपे उज्ज्वल सुवर्ण से निर्मित दिव्य मन्दिर में उपस्थित होकर ‘श्रीवैकुण्ठाय दिव्यविमानाय नमः’ यह कहकर उस दिव्य मन्दिर को साष्टांग प्रणाम करता है। आषाढ़ मास की प्रथम वर्षा से जैसे सम्पूर्ण वृक्षों के पत्र और शाखा वृद्धि को प्राप्त होते हैं, वैसे ही उस मुक्त जीव के आगमन से वृद्धि को प्राप्त एवं ये कौनसा वृक्ष है, इसके पत्र और शाखा इतने सुन्दर किस प्रकार हुए इस प्रकार दुर्विवेच्य, नाना प्रकार के रंग और गंध से युक्त पुष्पों – से परिपूर्ण एवं जहाँ पुष्परस सर्वदा प्रवाहित हो रहा है ऐसा कल्प वनों से वह दिवाली सुशोभित हो रहा है। कल्प वनों में जगह-जगह श्री वैकुंठनाथ भगवान और महालक्ष्मी जी के लिये नाना प्रकार के पुष्प और रत्नों से बने लीलामंडप,क्रीडाशैल (खेल के लिये बनाया नकली पर्वत ) हैं ऐसे बनों जिनके श्रवण करने मात्र से रोमांच हो जाता है, ऐसे मधुर स्वर में कुंजन करती हुई शुक- सारिका, मयूर है, कोयल अधिक पक्षियों के समूह से भरा हुआ है वैकुण्ठ में स्थान-स्थान पर पुष्करणियाँ भी हैं, वे, नित्यमुक्त जीवों के हृदय के समान स्वच्छ निर्मल शीतल अमृत रसरूपी दिव्यजल से भरी हैं और नाना प्रकार के जलचर पक्षियों द्वारा भरी हुई हैं। उन पुष्करिणियों में चन्द्रमुखी स्त्रियों के मुख और नेत्रों के समान पद्म, सौगन्धिक आदि नाना प्रकार के कमल पुष्प खिल रहे हैं उस स्थान पर नान प्रकार के पुष्पों से बनाया गया शयन करने का स्थल भी है। सुगन्धित पुष्पों से भरा, मधु के प्रवाह में निमग्न, केवल गाने के द्वारा जिसकी स्थिति का अनुमान किया जाता है, एवं सुनने से उन्मत्त सा बनाने वाले ऐसे दिव्य भ्रमरों (भोंरों) के दिव्य संगीत से व्याप्त, ऐसे हजारों उद्यानों से घिरा हुआ, उनके मध्यभाग में स्थित विशाल, रत्नों से बना आनन्दमय महामण्डप है।

यह महामणियों से बना मण्डप हजारों रत्नों से  जटित खम्भों से सुशोभित है। उभयविभूति के समस्त जीवों के रहने के लिये इसका एक अंश ही पर्याप्त है ऐसा विशाल स्थान यहाँ है। पद्म, सौगन्धिक, चन्दन, अगरु, कर्पूर आदि की सुगन्धयुक्त मन्द-मन्द वायु यहाँ सर्वत्र प्रवाहित होती रहती है, ऐसे असीम आनन्द के देने वाले श्रीमहामणि मण्डप में वह मुक्त जीव उपस्थित होकर और आनन्दमयाय मण्डपरत्नाय नमः’ कहकर इस दिव्य मंडप की साष्टांग करता  है, उस महामण्डप में समस्त आनन्द का मूल महानन्दरूप अमृत (भगवदनुभव रूप आनन्दामृत) का लगातार आस्वादन पाकर अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त एवं परब्रह्माश्रीवैकुण्ठनाथ की समता को प्राप्त अनादि, नित्यपार्षदगणों के अनुभव से पैदा होने वाले असीम आनन्द में सब समय सामवेद का गान होता रहता है।

१-अत्यन्त दरिद्र व्यक्ति जिसने कभी सौ रुपये भी नहीं देखे वह हठात् लाख रुपये पा जाय तो उसे इतना आनन्द होता है कि उससे उसकी मृत्यु भी हो सकती है। इसी प्रकार श्रीवैकुण्ठ में भगवत् सेवा से होने वाला असीम आनन्द कहीं भक्तों का प्राण न ले ले, इसलिये पार्षदगण परस्पर एक दूसरे को सावधान करते रहते है।

   २- नदी की गहराई जहाँ सबसे अधिक होती है वहाँ कोई डूबकर कहीं मर न जाय, इसलिये वहाँ बाँस या लकड़ी का चिह्न लगा होता है, इसे ‘ चिह्नयष्टि’ कहते हैं। इसी प्रकार भगवान् के अनन्त गुण, स्वभाव आदि अत्यन्त आनन्ददायक गुणों के चिन्तन से भक्तगण स्वयं को कहीं भूल ठग न लें, इसीलिये ऐसी अवस्था उत्पन्न हुई। अपने को संभालने के लिए भगवान के कोई एक विशेष स्वभाव या गुण या लीला का अनुभव करके स्वयं में धैर्यधारण करते है।

 

     सुन्दर मधुर वचनों से कविजन स्वयं अपने प्राण बचाकर भगवान की सेवा करो, कोई इस प्रकार कह रहा है। यह सुनकर कोई-कोई आनन्द रूप नदी में शील और गुणरूप अगाध स्थल में चिह्नयष्टि स्थापित करते हैं। संसार में रहते समय जो गुरु थे, उन्हें देखकर ‘दिव्य आभरण विशिष्ट हमारे उपकारक अत्यन्त सुन्दर पुण्डरीकाक्ष भगवान के दर्शन आपकी कृपा से मैंने प्राप्त किये हैं इस प्रकार कोई-कोई कहते हैं’। इस प्रकार गुरु के अनन्य दास को देखकर आपके चरण प्राप्त किये’ इन चरणों को भविष्य में भी सदैव इसी प्रकार प्राप्त करूँ” यह कहता है। ‘कोई’ अष्टाक्षर मन्त्र उच्चारण करता है’ इस उक्ति के अनुसार अनवरत (लगातार) जप के योग्य श्री मंत्र उच्चारण करके भगवान के चरणों में अपना आत्मसमर्पण करता है । मैं बड़ा पापी हूँ, मुझे बाधक गुणों से युक्त करता है’ उरुगुमालदशक में श्रीशठकोप स्वामी आल्वार की इस उक्ति के अनुसार दास भाव में ही अधिक आसक्त होकर ‘नम इत्येववादिन:’ कोई केवल ‘नमो नमः’ यही बोलते हैं। ‘नमः शब्द प्रयुंजते’ नमः शब्द का प्रयोग ही करते हैं। 

 प्रलय समुद्र में मार्कण्डेय ऋषि के समान आनन्द सागर में भ्रमण करने वाला, नित्य मुक्त जीवों के मुख निकला, कानों को आनन्द देने वाला उक्त वचनों को ये मुक्त जीव सुनते रहते हैं। पहिले वृद्धावस्था में क्रूर वाक्य बोलने वाले व्यक्ति के कठोर वचन सुनकर जितना दुख था, इस समय वह समस्त दुःख निवृत्त हो गया है, वही मुक्त जीव अब मधुर वाक्य सुनते-सुनते आगे बढ़ता हुआ परब्रह्म के विराजमान होने के दिव्य स्थान के समीप जाता है। उस विशाल महासभा के मध्यभाग में अपने-अपने मस्तक पर शंख, चक्र आदि दिव्य आयुध धारण करके, हाथ जोड़े पार्षदगण साष्टांग करते प्रणत हैं। जिसके मस्तक पर जो अस्त्र है, उस अस्त्र का जो नाम है उस पार्षद का भी वही नाम है। इनमें से श्रीविष्वक्सेन आदिक पार्षदगण अपने संकल्प के द्वारा इस ब्रह्माण्ड के समान अन्य नवीन ब्रह्माण्ड की सृष्टि पालन और संहार करने की सामर्थ्य वाले हैं। यह मुक्त जीव क्रम से सब पार्षदों को प्रणाम करके दर्शन करता रहता है। ।

 द्वितीय प्रकरण पूर्ण

Published by ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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