ईशोपनिषद् 16

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह तेजः ।

यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरूषः सोऽहमस्मि ।। 1.1.16 ।।

पदविभाग

पूषन् एकर्ष यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह तेजः यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि यः असौ असौ पुरुषः सः अहम् अस्मि

अन्वयार्थ-

( पूषन् ) हे भक्तों के पोषण करने वाली ( एकर्ष) हे अद्वितीय अतीन्द्रिय पदार्थ को देखनेवाले अथवा हे मुख्य ज्ञान स्वरूप (यम) हे सबके नियन्ता (सूर्य) हे अपने उपासकों की बुद्धि को सुन्दर प्रेरणा करने वाले (प्राजापत्य) हे प्रजा की रक्षा करने वाले (रश्मीन् ) आपके दिव्यरूप दर्शन की अनुपयोगी अपनी उग्र रश्मियों को (व्यूह) हटा लीजिये (तेजः) जो आपके दर्शन का उपयोगी तेज है उसको (समूह) इकट्ठा करिये (ते) तुम्हारा ( यत् ) जो श्रुतिप्रसिद्ध (कल्याणतमम्) परममङ्गलमय ( रूपम् ) दिव्यस्वरूप है (ते) तुम्हारे ( तत् ) उस अतिशय कल्याणमय दिव्य स्वरूप को (पश्यामि) मैं आपकी कृपा से देख लूँ (यः) जो (असौ) वह (असौ) प्राण में (पुरुषः) परमात्मा है (सः) वह (अहम्) में (अस्मि ) हूँ ॥१६॥

विशेषार्थ

हे सब भक्तों के पोषण करने वाले पूषन्! , हे अद्वितीय अतीन्द्रिय पदार्थ को देखनेवाले एकर्षे! हे सबका नियमन करनेवाले यम! हे स्वोपासकों की बुद्धि को सुन्दर प्रेरणा करने वाले! हे प्रजा की रक्षा करने वाले नारायण! आपके दिव्य स्वरूप दर्शन के अनुपयुक्त अपनी उग्र किरणों को हटा लीजिये और दर्शन के उपयोगी जो आपका तेज है उसको इकट्ठा कर लीजिये । ऋग्वेद में लिखा है
इन्द्रं मित्रं वरूणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् ।
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥ (ऋग्वेद ० अ० २ अ० ३ व० २२)

इन्द्र, सूर्य, वरुण, अग्नि, दिव्य, गरुड़, गरुत्मान् , दीप्तिमान, यम, वायु, एक, सन्मात्र इत्यादि अनेक प्रकार से विप्रगण नारायण को कहते हैं ॥ २।॥
भूतभृत ।

(गीता अ० ६ श्लोक ५)

मैं सब भूतों का धारण पोषण करने वाला हूँ ॥५॥
ज्योतिषां रविरंशुमान् ।

(गीता० अ० १० श्लोक ० २१)

ज्योतियों में किरण वाला सूर्य में हूँ ॥ २१॥
‘यमः संयमतामहम् । (गी०१०. श्लो० २६)

दण्ड देनेवालों में यम मैं हूँ ॥२६॥

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।‘ (गी० अ० ११ श्लोक ३६)
‘सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥ ४०॥

आप वायु, यम, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजापति और प्रपितामह हैं |३६| आप सबको व्याप्त कर रहे हैं अतः आप ही सब शब्द के वाच्य है ॥४०॥
ज्येष्ठः क्षेष्ठः प्रजापतिः। (महा० अनुशासन प० विष्णु का० श्ल० २१)
नियन्ता नियमो यमः॥१०॥ रविविरोचनः सूर्यः ॥१०७॥

ज्येष्ठ १, श्रेष्ठ २, प्रजापति ३ ॥२१॥ नियन्ता १ नियम २, यम ३ ॥१०॥ रवि १, विरोचन २, सूर्य ३ ये नारायण के नाम हैं ॥१०७॥

एकर्षि यहाँ पर एक का अर्थ अद्वितीय है क्योंकि लिखा है

एकोऽन्यार्थे प्रधाने च प्रथमे केवले तथा ।
साधारणे समानेऽल्ये संख्यायां च प्रयुज्यते ॥ (मनोरमा)

अन्यार्थ में, प्रधान में, प्रथम में, केवल में, साधारण में, समान में, अल्प में और संख्या में एक शब्द का प्रयोग होता है।

और ऋषि शब्द का अर्थ वायुपुराण में लिखा है:
‘ऋषीत्येष गतौ धातुः श्रुतौ सत्ये तपस्यथ । एतत्सन्नियतं यस्मिन् ब्रह्मणा स ऋषिः स्मृतः ॥ (वायु पु० अ० ५६ श्लो० ७६)
‘गत्यर्थादृषतेर्धातो: नाम निवृत्तिरादितः । यस्मादेष स्वयंभूतस्तस्माच्च ऋषिता स्मृता ॥८१॥

ऋषि धातु गमन, श्रवण, सत्य और तप इन अर्थों में प्रयुक्त होता है। ये सब बातें जिनके अन्दर एक साथ निश्चित रूप से हों उसी का नाम वेद ने ऋषि रखा ॥७६॥ गत्यर्थक ऋष धातु से ही ऋषि शब्द की निष्पित्त हुई है और आदि काल में यह ऋषि स्वयं उत्पन्न होता है इसीलिये इसकी ऋषि संज्ञा है ॥८१॥

इससे “एकर्षि” शब्द का अर्थ होता है—अद्वितीय अतीन्द्रियाथद्रष्टा ।

यह लिखा भी है-
‘नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा । (बृह० अ० ३ ब्रा० ७ श्रु० २३)

नारायण से अन्य द्रष्टा नहीं है ॥२३॥

यम शब्द का अर्थ है सर्वान्तर्यामी, क्योंकि

‘यः पृथिवी अन्तरो यमयति । (बृह० अ० ३ ब्रा० ७ श्रु० ३)

योऽपोऽन्तरो यमयति ॥४॥ योऽग्निमन्तरो यमयति ॥५॥

योऽन्तरिक्षमन्तरो यमयति ॥६॥ यो वायुमन्तरो यमयति ॥७॥

यो दिवमन्तरो यमयति ॥८॥ य आदित्यमन्तरो यमयति ॥8॥

यो दिशोऽन्तरो यमयति ॥१०॥ यश्चन्द्रतारकमन्तरो यमयति ॥११॥

जो नारायण भीतर रहकर पृथ्वी को नियमन करता है।।३ जो भीतर रहकर जल को नियमन करता है ॥४| जो भीतर रहकर अग्नि को नियमन करता है।५॥ जो भीतर रहकर अंतरिक्ष को नियमन करता है।६॥जो भीतर रहकर वायु को नियमन करता है ।I७॥ जो भीतर रहकर दिवलोक को नियान करता है ।।II जो भीतर रहकर सूर्य को नियमन करता है ॥६॥ जो भीतर रहकर दिशा को नियमन करता है ।॥१०॥ जो भीतर रहकर चन्द्रमा और ताराओं को नियमन करता है ॥११॥ जो भीतर रहकर आकाश को नियमन करता है ।।१२॥ जो भीतर रहकर अन्धकार को नियमन करता है ।।१३।। जो भीतर रहकर तेज को नियमन करता है ॥१४॥ जो भीतर रहकर समस्त भूतों को नियमन करता है ।।१५।। जो भीतर रहकर प्राणों को नियमन करता है ॥१६॥ जो भीतर रहकर वाणी को नियमन करता है।।१७॥ जो भीतर रहकर नेत्र को नियमन करता है ।१८|| जो भीतर रहकर श्रोत्र को नियेमन करता है ॥१६॥ जो भीतर रहकर मन को नियमन करता है ॥२०॥ जो भीतर रहकर त्वचा को नियमन करता है ॥२१॥ जो भीतर रहकर विज्ञान आत्मा को नियमन करता है ॥२२॥ जो भीतर रहकर वीर्य को नियमन करता है ।।२३। और प्रजापति को ही प्राजापत्य कहते हैं ।

यजुर्वेद में लिखा है: प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तः (य० अ० ३१ मं० १६)

प्रजा की रक्षा करने वाला नारायण गर्भ के भीतर चलता है ॥१६॥

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ॥‘ (गी० अ० ३ श्लोक ० १०)

प्रजारक्षक नारायण ने पहले यज्ञ के सहित प्रजा को रचकर कहा ॥१०। इससे प्रजापति शब्द नारायण वाचक ही है ।

‘पूषन्’, ‘एक्’, ‘यम’ ‘सूर्य और ‘प्राजापत्य इन पाँच संबोधन के पदों से पर १, व्यूह २, विभव ३, अन्तर्यामी ४, अर्चावतार ५ ये पांच प्रकार के परस्वरुप का संकेत यहाँ पर श्रुति ने किया है ।

हे परब्रह्म नारायण,

‘आदित्यवर्ण तमसः परस्तात् । (श्वे० अ० ३ श्रु०८) (गी० अ० ८ श्लो० ६)

अन्धकार से परे सूर्य के समान वर्णवाला ॥८॥ |॥|६॥

इस श्रुति और स्मृति में प्रसिद्ध सौंदर्या अधिक गुणों से युक्त अतिशय कल्याणमय शुभाश्रय आपके दिव्य स्वरूप को मैं देख लूँ । जो विप्रकृष्टदेशवर्ती वह प्राण में परम पुरुष है। क्योंकि यह लिखा है-

‘इदमस्तु सन्निकृष्टे समीपतरवर्ति चैतदो रूपं।

अदसस्तु विप्रकृष्टे तदिति परोक्षे विजानीयात् ‘ (मनोरमा)

सन्निकृष्ट, में ‘इदम्’ शब्द का और समीपतर में ‘एतत्’ शब्द का तथा विप्रकृष्ट में ‘अदस्’ शब्द का और परोक्ष में ‘तत्’ शब्द का प्रयोग होता है ऐसा जान ले। वो पहला ‘असौ’ पद ‘अदस्’ शब्द का प्रथमा के एक वचन का रूप है। इससे इसका-‘विप्रकृष्ट देशावर्ती वह’ यह अर्थ होता है । तथा दूसरा ‘असौ’ पद ‘असु’ शब्द का सप्तमी एकवचन का रूप है। इससे इसका ‘प्राण में यह अर्थ होता है। क्योंकि यह लिखा है:

अशोच्यनन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥’ (गी० अ० २ श्लो० ११)

पण्डित लोग गतप्राणवाले शरीरों को और अविनाशी जीवों को नहीं शोक करते हैं ॥११||

इस श्लोक की व्यख्या में श्रीशेषावतार भगवद्रामानुजापरावतार श्रीवरवर मुनीन्द्र ने ‘असवः प्राणाः’ ऐसी स्पष्ट व्याख्या की है। इससे तथा

पुसि भूम्न्यसवः प्राणाः। (अमरको० कां० २ वर्ग ० ८ श्लोक ११६)

असु १ प्राण २ ये दो नाम प्राणों के हैं॥ ११६॥

इस अमरकोश के प्रमाण से ‘प्राण में यह अर्थ होता है । तब जो वह प्राण में परमात्मा है वह मैं हूँ |अब यहाँ पर यह प्रश्न होता है कि ‘पुरुष’ शब्द का अर्थ परब्रह्म नारायण है इसमें क्या प्रमाण है ? इसका उत्तर यह लिखा है

‘सहस्रशीर्षा पुरुषः (ऋग्वेद. अष्टक ० ८ मण्डल० १० अध्या० ४ अनुवा० ७ सूक्त० ६ में० १)

हजारों शिरवाला पुरुष परब्रह्म नारायण है ॥१॥

सहस्रशीषों पुरुषः ।(यजुर्वे, अध्या. ३१ मं. १)

अनन्तमस्तकवाला परमात्मा है।।१॥

‘सहस्रशीर्षा पुरुषः । (सामवेद. पूर्वाचिक. प्रपाठक, ६ अर्धप्रपाठक. ३ सूक्त. १३ मं. ३)

हजारों शिरवाला परम पुरुष है ॥३॥

सहस्रबाहु पुरुषः। (अथर्ववेद. काण्ड १६ अनुवाक १ सूक्त ६ मं. १).

हजारों भुजावाला नारायण परम पुरुष है ॥२॥

‘पुरुषान्न परं किश्चित् । (कठोप. अध्या. १ वल्ली ३ श्रु. ११)

परब्रह्म नारायण से श्रेष्ठ कोई नहीं है ॥११॥

अङ्गष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति (कठो. अध्या. २ व. ४ श्रु. १२) ।

अंगुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः ।’

अंगुष्ठपरिमाण अन्तर्यामी पारब्रह्म नारायण आत्मा के मध्य में स्थित है ॥१२॥ अंगुष्ठ प्रमाण अन्तर्यामी नारायण धुएँ से रहित प्रकाश के समान देह में स्थित है ॥१३॥

इमाः पोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति । (प्रश्नो. प्रश्न. ६ श्रु.५)

परब्रह्म नारायण की ओर जानेवाली यह सोलह कला नारायण को प्राप्त होकर विलीन हो जाती हैं ।५॥

‘येनाक्षरं पुरुषं वेद (मुण्डकोप. मुण्ड. १ खण्ड २ श्रु. १३)

जिससे अविनाशी परब्रह्म नारायण को जानता है ॥१३॥

उपासते पुरुषं ये सकामास्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः। (मुण्डको. मुण्डक, ३ मं, २ शु. १)

जो निष्काम बुद्धिमान् परब्रह्म नारायण की उपासना करते हैं वे निश्चय जन्म लाँघ जाते हैं ॥१॥

‘य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते ।’ (छान्दोग्य. अध्याय १ प्रपा. १ ते. ६ शु. ६)

जो यह सूर्य-मण्डल में हिरण्मय परब्रह्म नारायण देखा जाता है ॥६॥

य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते ।‘ (छा. अ. १ प्रपा. १ खं. ७ श्रु० ५)

जो यह नेत्र के भीतर परब्रह्म नारायण देखा जाता है । ।५॥

य एष चन्द्रमसि पुरुषो दृश्यते । (छा. अ. ४ खं. १२ श्रु० १)

जो यह चन्द्रमा में परब्रह्म नारायण देखा जाता है ॥शा

योऽसावसौ पुरुषः । (बृह. अ. ५ ब्रा. १५ श्रु. १)

जो सूर्य मंडल में वह परब्रह्म नारायण है ॥१॥

वेदाहमेतं पुरुषम् । (श्वेता. अ. ३ श्रु. ८)

तेनेदं पूर्ण पुरुषेण सर्वम् ॥ ४

उस परब्रह्म नारायण को मैं जानता हूँ ॥॥ उस परब्रह्म नारायण से यह समस्त जगत् पूर्ण है ||

पुरुषो ह वै नारायणोऽकामयत ।’(नारायण. श्री. १)

निश्चय कर के परब्रह्म नारायण ने इच्छा की ॥१॥

‘ऋतं सत्यं परं ब्रह्म पुरुषम् (तैत्तिरीयारण्यक अनुवाक १२)

ऋत सत्य परब्रह्म नारायण को ॥१२॥

इमे वै लोकाः पूरयमेव पुरुषो योऽयं पवते योऽस्यां पुरि शेते तस्मात्पुरुषः। (शतपथ १३। ६। २॥ १)

इन लोकों में पूर्ण होने से और शयन करने से यह नारायण पुरुष है

अनेन विधिना कृत्वा स्नपनं पुरुषस्य तु ।

दत्वा पायसमन्नं च शेष परिसमापयेत् ।। (बौधायन सूत्र विष्ण्वाराधनप्रकरण)

इस विधि से परब्रह्म नारायण का स्नान करके और पायदान को निवेदन करके शेष क्रिया को समाप्त करे ।

स्वहृदयपद्मस्यावाङ्भुखस्य मध्ये दीपवत्पुरुषं ध्यायेत् ।(विष्णु स्मृ. अध्याय ६८)

अवाङ्मुख अपने हृदय कमल मध्य में दीप के समान परब्रह्म नारायण का ध्यान करे ॥६८

एष बै पुरुष विष्णुव्येक्त्याव्यक्तः सनातनः। (शङ्खस्मृ० अध्या०७)

यह परब्रह्म नारायण निश्चय कर व्यक्ति से अव्यक्त सनातन है ॥७॥

पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ।‘ (गी० अ० १० श्लो० १२)

सब ऋषिगण आपको-सनातन दिव्य सब देवों का आदि देव अजन्मा सर्वव्यापी परब्रह्म नारायण कहते हैं ॥१२॥

सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे । (गी० अ० ११ श्लो०१८)

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः ॥ ३८॥

आप सनातन परब्रह्म नारायण है ऐसा मेरा मत है ॥१८|| आप आदिदेव सनातन परब्रह्म नारायण हैं ॥३८॥

अव्ययः पुरुष: साक्षी । (म० भा० अनुशा० विष्णुस० श्लो० २)

महतस्तमसः पारे पुरुषं ह्यतितेजसम् । (महामा० शान्तिप० भीष्मस्तवरा० श्लोक ४३)

बड़े अन्धकार से परे अतितेजस्वी परब्रह्म नारायण हैं।४३॥

युगान्त शेषं पुरुषं पुराणं तं वासुदेव शरणं प्रपद्ये ।‘ (महाभा० शान्तिप० गजेन्द्र मोक्ष श्लोक ० ७५)

युगान्त में रहने वाले सनातन सर्वव्यापी उस वासुदेव परब्रह्म नारायण की शरण मैं प्राप्त करता हूँ ।॥७५॥

प्राणायामेन पुरुषं ध्यायमाना जनानाम् । (वाल्मीकि रामा)

प्राणायाम से जनार्दन परब्रह्म नारायण का चिंतन करती हुई ।।

पुरुषस्यांशसंभूतं त्वां वयं निरषेष्महि । (हरिवंश)

से हम परब्रह्म नारायण के अंश उत्पन्न आप का निर्णय करते हैं ।।

तत्र गत्वा जगन्नाथ वासुदेवं वृषाकपि ।
पुरुष पुरुषसूक्त न उपतस्थे समाहितः ॥’ (श्रीमद् भागवत)
वहाँ पर जाकर वृषाकपि अखिल ब्रह्माण्ड नायक सर्वव्यापक परब्रह्म नारायण को समाहित होकर पुरुषक्त से उपस्थान किये ।

अथवा पुरुष सूक्तेन पुरुषं नित्यमर्चयेत् । (अग्निपुराण)

अथवा पुरुष सूक्त से नित्यप्रति परब्रह्म नारायण की पूजा करे ।

सर्वलोकपतिः साक्षात्पुरुषः प्रोच्यते हरिः ।

तं विना पुण्डरीकाक्षं कोऽन्यः पुरुष शब्दभाक् ।। (नरसिंहपुरा.)

अखिल ब्रह्माण्ड नायक परब्रह्म नारायण साक्षात् पुरुष शब्द से कहे जाते हैं । उस कौन कमल नयन परब्रह्म बिना दूसरा पुरुष शब्द से कहा जा सकता है ।

पुंसंज्ञे तु शरीरेऽस्मिन् शयनात्पुरुषो हरिः । शकारस्य षकारोयं व्यत्ययेन प्रयुज्यते ॥ (पद्म पुराण)

यदि वा पुरुवासीति पुरुषः प्रोच्यते हरिः। यदि या पूर्वमेवासमिहेति पुरुष विदुः ।

यदि वा बहुरानी विष्णु पुरुष उच्यते ॥ पूर्णत्वात्पुरुषो विष्णुः पुराणत्वाच शार्ङ्गिणः ।

पुराण भजनाच्चाति विष्णुः पुरुष ईयते ॥  यद्वा पुरुष शब्दों रूढ्या वक्ति जनार्दनम् ।

पुम् नाम इस शरीर में सोने से नारायण भगवान पुरुष हैं । शकार का पुरुषशब्द में व्यत्यय से षकार प्रयोग किया जाता है । अथवा इस शरीर में नारायण भगवान् रहते हैं इससे पुरुष कहे जाते हैं । या शरीर में वास करते हैं इससे परब्रह्म नारायण पुरुष कहे जाते हैं। अथवा इस संसार में पहले से नारायण भगवान् थे इससे महर्षि लोग उनको पुरुष जानते हैं । या बहुत दान देने से ही विष्णु भगवान् पुरुष शब्द से कहे जाते हैं । नारायण भगवान के पूर्ण होने से विष्णु पुरुष कहे जाते है। अथवा सबसे पुराने होने से परब्रह्म नारायण पुरुष कहे जाते हैं । या पुराण के सेवन करने से परब्रह्म नारायण पुरुष कहे जाते हैं। अथवा यह पुरुषशब्द रूढि से ही परब्रह्म नारायण को कहता है। 

‘पुराण पुरुष यज्ञः पुरुषः पुरुषोतमः । (अभिधानको०)

पुराण पुरुष १, यश ३, पुरुष ६ और पुरुषोत्तम ४ ये परब्रह्म नारायण के नाम हैं ।

ये श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराण और कोश प्रमाण हैं कि ‘पुरुष’ शब्द का अर्थ परब्रह्म नारायण है । ईशोपनिषद् की सोलहरवीं श्रुति बृहदारण्योपनिषद् (अ० ५- ब्रा० १५ श्रु० २) में भी और ‘योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि’ शुक्लयजुर्वेद (अ० ४० में १७) के उत्तरार्ध में भी है परन्तु संहिता में ‘योसावादित्ये पुरुषः ‘ ऐसा पाठ है ॥१६॥

 

अडियेन माधव श्रीनिवास रामानुज दास

 

complete list of shlokas: ईशोपनिषद् गूढार्थदीपिका व्याख्या

Published by ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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