ईशोपनिषद् 14

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद् वरवरमुनये नमः

  संभूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयं सह ।
विनाशेन मृत्युं तीर्खा संभूत्यामृतमश्नुते ॥१४॥

संभूतिम् च विनाशम् च यः तत् वेद उभयम् सह  विनाशेन मृत्युम् तीर्खा संभूत्या अमृतम् अश्नुते

अन्वयार्थ-

(यः) जो यथार्थ ब्रह्मविद्या के उपदेशयुक्त प्रपन्न ( संभूतिम् ) समाधिरूप ब्रह्मानुभूति को () और ( विनाशम् ) समाधि के अङ्गभूत योग के विरोधी निषिद्ध निवृत्ति को () भी ( तत् ) इन ( उभयम् ) दोनों को (सह) एक ही साथ (वेद) अङ्गाङ्गिभाव से अनुष्ठान करने योग्य यथार्थरुप से जान लेता है, वह भगवद्भक्त (विनाशेन) विरोधिनिवृत्तिरूप योगाङ्ग का सेवन करने से (मृत्युम् ) समाधि विरोधी पाप को (तीर्खा) पार करके (संभूत्या) समाधि से (अमृतम् ) परब्रह्मा नारायण को (अश्नुते) प्राप्त कर लेता है ||१४||

विशेषार्थ

जो यथार्थ ब्रह्मविद्या के उपदेशयुक्त भक्त पुरुष समाधिरूप ब्रह्मानुभूति को और समाधि के अङ्गभूत विरोधी निवृत्तिरूप यम, नियमादिक योग के अङ्ग को इन दोनों एक ही साथ अङ्गाङ्गिभाव से अनुष्ठान करने योग्य जानता है वह भगवद्भक्त विरोधिवृत्तिरूप योगाङ्ग यम, नियमादिक का सेवन करने से समाधि विरोधी पाप को निर्विशेष दूर उल्लंघन करके समाधि से नारायण को प्राप्त कर लेता है । पातञ्जलयोगदर्शन में लिखा है

योगश्चित्त वृत्ति निरोधः । ‘( यो० अ० १ पा० १ ०२)

वृत्तयः पश्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः ॥५॥ प्रमाणविपर्ययविकल्प निद्रा स्मृतयः ॥६॥ प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥७॥ विपर्ययमिथ्याज्ञानविद्रुपप्रतिष्ठम् ॥८॥ शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्प: ॥९॥ अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिनिद्रा ॥१०॥ अनुभूतविषयासंप्रमोष स्मृतिः ॥११॥

चित्तवृत्ति निरोध को योग कहते हैं ॥२॥ वे क्लिष्ट और अक्लिष्ट चित्तको वृत्तियाँ पांच प्रकार की होती हैं ॥५॥ प्रमाण १, विपर्यय २, विकल्प ३, निद्रा ४, और स्मृति ५ ये पाँच हैं ॥६॥ प्रत्यक्ष १, अनुमान २, आगम ३ ये प्रमाण हैं ॥७॥ मिथ्याज्ञान अतद्रु पप्रतिष्ठा को विपर्यय कहते हैं ॥८॥ शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्य को विकल्प कहते हैं ॥६॥ अभावप्रत्यय को अवलम्बन करनेवाली वृत्ति को निद्रा कहते हैं ॥११॥ अनुभूतविषय के असंप्रमोष को स्मृति कहते हैं ॥११॥

‘अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः।। (यो अ० १ प० १ सू० १२)

तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः॥१३॥ दृष्ठानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥१५॥ तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ॥१६॥

वहाँ पर स्थिति में यत्न करने को अभ्यास कहते हैं ॥१३॥ अभ्यास और वैराग्य से चित्तवृत्ति का निरोध होता है ॥१२।। देखे या सुने हुए विषय की तृष्णा को त्याग देना वशीकार संज्ञा वैराग्य है ॥१५|| वशीकार वैराग्य से श्रेष्ठ पुरुष की ख्याति से गुणवैतृष्ण्य वैराग्य है ॥१६।। और लिखा है

‘योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः ।। (यो० अ० १ पा० २ सू० २८)
‘यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि ॥२६॥ अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहाः यमाः ॥३०॥ शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः॥ ३२॥

योगाङ्ग  के अनुष्ठान से अशुद्धिक्षय होने पर आविवेक ख्याति से ज्ञान का प्रकाश होता है ॥२८॥ यम १, नियम २, आसन ३, प्राणायाम ४, प्रत्याहार ५, धारणा ६, ध्यान ७ और समाधि ८ ये आठ योग के अंग है ॥२६॥ अहिंसा १ सत्य २, अस्तेय ३, ब्रह्मचर्य ४ और अपरिग्रह ५ ये यम है ॥ शौच १, सन्तोष २, तप ३, स्वाध्याय ४ और ईश्वरप्रणिाधान ५ ये नियम हैं ॥३॥

‘अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥३५॥ सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ॥३६॥ अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ॥३॥ ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ॥३८॥ अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासम्बोधः ॥३६॥ शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥४०॥ सन्तोषादनुत्तमसुखलाभः ॥४२॥ कायेन्द्रियसिद्धिाशुद्धिक्षयात्तपसः ॥४३॥स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः ॥४४॥ समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात॥ स्थिरमुखमासनम् ॥४६॥ ततो द्वन्द्वानभिवातः ॥४८॥
अहिंसा सिद्ध होने पर उस पुरुष की सन्निधि में वैरत्याग हो जाता ॥३५॥ सत्य सिद्ध होने पर जो कहता है वह यथार्थ होता है ॥३६॥ अस्तेय सिद्ध होने पर सब रत्न प्राप्त होते हैं ॥३७|| ब्रह्मचर्य सिद्ध होने पर वीर्य लाभ होता है ||३||
अपरिग्रह सिद्ध होने पर जन्मान्तर का ज्ञान होता है ||१६|| शौच से अपने अङ्ग में घृणा और दूसरों से असंसर्ग होता है ॥४०॥ संतोष से श्रेष्ठ सुख का लाभ होता है ॥४२॥ तपस्या से अशुद्धिक्षय के द्वारा शरीर और इन्द्रिय सिद्ध हो जाते हैं॥४३॥ स्वाध्याय से इष्टदेवता का संयोग होता है ||४४।। ईश्वर के प्रणिधान से समाधि सिद्ध होती है ।।४५|| स्थिर तथा सुख पूर्वक को आसन कहते है। ॥४६॥ आसन सिद्ध होने से शीत, उष्ण आदिक द्वन्द्व का नाश हो जाता है ।।४।।

‘तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोगतिविच्छेदः प्राणायामः ॥४६॥ ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥५२॥ धारणासु च योग्यता मनसः ॥५३॥ स्वविषयासंप्रयोगे चित्तस्य स्वरूपानुसार इन्द्रियाणां प्रत्याहारः ॥५४॥ ततः परमावश्यतेन्द्रियाणाम् ॥

आसन सिद्ध होने पर श्वास-प्रश्वास की गतिका विच्छेद करना ही प्राणायाम है ४॥ प्राणायाम से आत्मप्रकाश का आवरण नष्ट हो जाता है |५२॥ और धारणा में मन की योग्यता होती है |५३॥ अपने विषयों को चित्त से संयोग न करते हुए स्वस्वरूप में इन्द्रियों का स्थिर होना सिद्ध ही प्रत्याहार है ॥५४॥ प्रत्याहार होने से समस्त इन्द्रियाँ अत्यन्त वश में हो जाती हैं ।|५५॥

देशबन्धश्चित्तस्य धारणा । (यो० अ० १ पा० ३ सू  १)

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥२॥ तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्वयमिव समाधिः ॥

चित्त को शरीर के किसी देश में बाँधना ही धारणा है ॥१॥ उस धारणा में प्रतीत वस्तु की एकतानता को ध्यान कहते हैं ॥२॥ ध्यान में प्राप्त वस्तु का ही केवल प्रकाश होना अपने देहादिक को भूल जाना ही समाधि है ॥३॥ समाधि के विषय में जिसको अधिक जानना हो वह मेरा बनाया हुआ ‘वैदिकयोगसंग्रह’ ग्रन्थ को देख ले । ईशोपनिषद् की चौदहवीं श्रुति शुक्ल यजुर्वेद (अ० ४० मं० ११) में भी है । १४|

 

अडियेन माधव श्रीनिवास रामानुज दास

 

 

Published by ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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