प्रथम प्रकरण (हिन्दी अनुवाद)

लोकाचार्याय गुरवे कृष्णपादस्य सूनवे। संसारभोगिसंदष्टे जीवजीवातवे नमः ।।

श्रीवैकुण्ठ में स्थित नित्य और मुक्त जीवात्माओं एवं संसार में स्थित बद्ध जीवों के बीच क्या पार्थक्य है, उसी का वर्णन करते हैं

श्रिय: पत्युः सर्वेश्वरस्य विभूतिद्वयमपि शेषभूत भवति। तत्र भोगविभूतौ वर्तमाना: कान्तिमत्कटकवती श्री: त्वं चे’त्युक्तप्रकारेण तदाज्ञा यथैकैव स्यात् तथा तदभिमानेऽन्तर्भवन्ति। लीलाविभूतिस्थास्तु ते नित्ययुक्ता इवच्छन्दानुवर्तिनो न भवन्ति। किन्तु संकल्पानुविधायिनः,

श्रिय:पति सर्वेश्वर नारायण की ‘भोग विभूति (त्रिपाद विभूति) एवं ‘लीला विभूति” नामक दोनों ही विभूतियाँ शेष वस्तु हैं। इनमें भोग विभूति स्थित नित्य जीव एवं मुक्तजीव गण “अत्यन्त कान्तियुक्तवलय (बाजूबन्द) धारण करने वाली महालक्ष्मी और आप स्वयं ऊपरस्थित लोक वैकुण्ठ धाम में विचरण करते हैं ।” आल्वार की इस सूक्ति के अभिप्राय, अनुसार जिस कार्य के करने से एवं जिस प्रकार रहने से केवल भगवान की आज्ञा ही सर्वोपरि विराजमान रहे ऐसे वे मुक्त लोग सब विषयों में भगवान को यह अभिमत है ऐसा विचार कर उसी प्रकार भगवान की चाह के अन्तर्भुक्त होकर रहते हैं। किन्तु लीलाविभूति में स्थित बद्ध जीवों अल्पज्ञ होने से भगवान को इस समय क्या चाहना है यह नहीं जान पाते। अत: परमात्मा ने की इच्छानुसार चलने में असमर्थ होते हैं। इसी कारण से भगवान इन जीवों को अपने संकल्प के अनुसार चलाते हैं।

टिप्पणी १-

भारतीय वाङ्मय वेद, उपनिषद् आदि के द्वारा शास्त्रीय विचार करने से ज्ञात होता है कि शास्त्र ने सम्पूर्ण विश्व को दो प्रधान भागों में विभक्त कर रखा है। एक भाग का नाम त्रिपाद्विभूति, वैकुण्ठ, परम पद, नित्य विभूति और दूसरे का नाम संसार मंडल, लीला विभूति इत्यादि है।

नित्य विभूति अनादिकाल से स्थित है। इसका सृजन, संहार, कालकृत परिवर्तन न होने से इसे नित्यविभूति कहा जाता है, यहाँ पर भगवान के स्वतन्त्र संकल्पसे सामयिक परिवर्तन होता है। यहाँ पर परब्रह्म परमात्मा वैकुण्ठनाथ नारायण अपने असंख्य महिषीवर्ग, नित्युक्त, सेवक, सेविकाओं के साथ आनन्द करते हैं अतएव इसे नित्यविभूति कहा जाता है। ऊपर की ओर एवं चारों ओर यह सीमा रहित है। केवल नीचे के भाग में विरजा नदी नामक अप्राकृत असीम जलराशि इसकी सीमा है। यहाँ वैकुण्ठ में अनादि काल से रहते हुए जो भगवान की सेवा करते हैं वे नित्य जीवात्मा कहलाते हैं। ये जीव किसी विशेष कार्य के लिये भगवान के आदेशानुसार संसार में जन्म ग्रहण करते मैं फिर भी किसी बन्धन से आबद्ध नहीं होते एवं उस कार्य के पूर्ण हो जाने पर पुन: वैकुण्ठ में ही चले जाते हैं।

जो जीव पहले बद्ध थे बाद भगवत्कृपा से संसार बन्धन से मुक्त होकर वैकुण्ठ में नित्यजीवों के साथ उन्हीं के समान रहकर सब प्रकार से भगवत्सेवा करते हैं वे मुक्त जीव कहलाते हैं। किसी भी समय मुक्त जीवात्माओं का संसार में फिर से जन्म नहीं होता है।

विरजा नदी के नीचे के भाग में अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड है। काल के द्वारा भगवान इनकी सृष्टि स्थिति और संहार बार-बार करते हैं। यहाँ इन ब्रह्माण्डों में भगवान बुद्ध जीवों के कर्मानुसार शासन करते हैं। यह शासन ही उनकी लीला है। इसी कारण से अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों को भगवान की लीलाविभूति कहा जाता है। लीलाविभूति नीचे की ओर एवं चारों ओर से सीमा रहित है। विरजा नदी इसकी ऊपरी भाग की सीमा है। त्रिपद्विभूति ही मुक्त जीवों का गन्तव्य स्थान है। वहाँ न जाने का मार्ग ही अर्चिरादि मार्ग या देवयान मार्ग कहा जाता है।

नम इत्येव वादिनः

इत्युक्तस्थितिविपरीततया, न नमेयम् ईश्वरोऽहम् इत्युक्तप्रकारेण अहम् मदीयमिति तिष्ठन्ति ते।

नम इत्येव वादिनः :- ‘नमो नमः’ यही उच्चारण करते रहते हैं। नित्यमुक्त जीवों की इस वाक्यावली और परिस्थिति के विपरीत होकर ‘न नमेयम्’। मैं किसी प्रकार से नमन नहीं करूंगा, नम्रता का भाव नहीं लाऊँगा। ‘ईश्वरोऽहम्’ मैं ही ईश्वर हूँ। रामायण और गीता की इस भक्ति के अनुसार बद्ध जीव अपने स्थान पर ही रहते हैं अर्थात् मैं अपने ही आधीन हूँ, स्वतन्त्र हूँ, यही माने हैं।

टिप्पणी –

२- एक बार श्री नारद जी भगवान के दर्शन हेतु श्वेतद्वीप गये। वहाँ उन्हों देखा कि वहाँ के भगवद़वक्तजन अपने मस्तक पर अंजलि बांध कर भक्ति की पराकाष्ठा के वशीभूत हो ‘नमो नमः’ ‘नमो नमः” ‘नमो नमः’ यही बोल रहे हैं।

न मः, मम न मैं अपना नहीं हूँ, मैं भगवान् के परतन्त्र हूँ, उनका दास हूँ। नमः शब्द के इस प्रकार के अर्थानुसार वे लोग नाम: शब्द उच्चारण करके भगवान् के समक्ष अपना पारतन्त्र्य निवेदन कर रहे हैं। श्वेतद्वीप से लौटकर युधिष्ठिर जी के पास आकर नारदजी ने कहा धर्मराज! श्वेतद्वीप में मैंने भक्तों के जो आचरण देखे, वे ही वास्तव में मुक्त जीवों के लक्षण हैं। (महाभारत में दृष्टव्य)

३- न नमेयम्- यह रावण की उक्ति है। रावण ने कहा मेरे दो टुकड़े करके भले ही मार गिरा दे किन्तु में रामचन्द्र के सामने नमन नहीं करेगा। उसके सामने नम्र नहीं हो सकता।

व्यापारनिष्ठा अमराः; तद्विपरीततया ऐते, अन्यं देवं स्तुत्वा नृत्यन्ति ते।

नित्यमुक्त जीवगण भगवत्सेवा में निष्ठावान अतएव अमर देवाधिदेव के परायण होते हैं, किन्तु बद्ध जीव उनसे विपरीत संसार मण्डल के अन्य किसी एक देवता की स्तुति करते एवं उसी के सामने गान और नृत्य करते हैं।

उत्कृष्टा वेदविमलाः इत्युक्ता महापुरुषाः, एते क्षुद्राः। ते दिव्यज्ञानोपपन्नाः, एते अज्ञा मानवाः। ते तेजोरूपदिव्यदेहविशिष्टाः, एते मलिनशरीराः। ते विपन्यव: इत्युक्तप्रकारेण भगवत् स्तुतिशीलाः, एते अन्यान् स्तुवन्ति। ते, 

वे ‘वेदज्ञान ज्ञान द्वारा श्रेष्ठ‘ आलवार की इस उक्ति के अनुसार बद्ध जीवों नित्य जीवों के समान श्रेष्ठ नहीं हैं, किन्तु वे बद्धजीव उन मुक्तात्माओं की तुलना में अत्यन्त नीचे स्थान पर हैं। ‘भगवान् उनसे कभी विस्मृत नहीं होते’ इस प्रकार दिव्य ज्ञान वाले वे इस भक्ति के अनुसार नित्यमुक्त जीव गण जैसे दिव्यज्ञानवान् हैं। बद्धजीव वैसे ज्ञान वाले नहीं हैं। नित्यमुक्त जीवों के समान ज्वाला से परिवेष्टित तेज: स्वरूप ज्यातिर्मय शरीर धारण के बदले में बद्धजीव मलिन देह धारण करके रहते हैं । ‘विपन्यवो:’ सर्वदा स्तुति करते हैं। पार्षदों के द्वारा स्तुति करने योग्य ‘उसे भी प्रधान स्वामी कौन है’ इस उक्ति के विपरीत होकर परब्रह्म से विपरीत स्वभाव विशिष्ट हो किसी देवतान्तर का आश्रय ग्रहण कर बद्धजीव उसी देवता की स्तुति करते हैं।

४- विपन्यवः-पण स्तुती धातु से पण्यते-स्तौति यः स पन्युः ते, विशेषेणपुक्ताः तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवां सः समिन्धते विष्णो र्यत् परमं पदम्। वैकुण्ठ में भय की शंका न रहने पर भी असीम प्रेम के भूत हो वहाँ के भगवत्पार्षदगण भय की आशंका करके भगवान् के मंगल के लिये भगवद्गुणों से पूर्ण स्तुति करते हुए सर्वदा जागरूक रहते हैं अर्थात् सावधान होकर सदैव भगवान का मंगलाशासन करते रहते हैं। विष्णु भगवान का परमपद इसी प्रकार प्रकाशमान है।

तवैव दास्यं करवाम इत्युक्तप्रकारेण तस्य दास्यं कुर्वन्ति; एते मारक्रूरशरान् सेवमानाः, भक्तिधारणपूर्वकं कैङ्कर्यामृतमभुंजानाः कामिन्यधरामृतं पिबन्तः; 

एकमात्र आपकी ही सेवा करूँगी‘ (५) श्रीगोदादेवी की इस उक्ति के अनुसार बद्ध जीवों भगवान की सेवा न करके कामदेव के क्रूर बाणों का आघात सहन कर भगवत्सेवा से अमोघं होने वाले आनन्दामृत का पान न करके कामिनी के अधरामृत का पान करते रहते हैं।

टिप्पणी –

५-दक्षिण भारत में महालक्ष्मी की अवतार स्त्री आलवार श्रीगोदादेवी ने भगवान से कहा है कि ‘आपकी सेवा से आपको भी आनन्द हो एवं मुझे भी आनन्द हो ऐसा उद्देश्य न रहे, किन्तु केवल आपको ही आनन्द देने के लिए आपकी सेवा प्राप्त करूँ, यही मेरी अभिलाषा है।

स एकधा भवति द्विधा भवति इत्यस्य वैपरीत्येन  अनेक कुलेषु जायमाना:, चक्रशङ्खे न धृत्वा तेन सहासंचरन्तः शरीरमार्गे भ्रमन्तः

मुक्त जीव एक, दो, पाँच, सात, सौ, हजार शरीर धारण करते है बद्धजीव उपनिषद् की इस उक्ति के विपरीत अनेक कुलों में जन्म लेते है, एवं सुन्दर रूप धारणकर हाथ में शंख, चक्र धारण कर भगवान के साथ विचरण न कर चौरासी लाख यौनियों में शरीर लेकर भ्रमण करते रहते हैं।

– छान्दोग्य उपनिषद में आया है कि प्रभु को जब जिस प्रकार की सेवा की आवश्यकता होती है, मुक्त जीव वैकुण्ठ में उसके अनुकूल बहु शरीर एक समय में ही धारण करते हैं। पांचरात्र में है कि यथा तरुणावत्सा वत्सो, वत्सो वा मातरं, छाया वा सत्वमनु गच्छेत् अर्थात् नवजात वत्स के पीछे जैसे गाय, गाय के पीछे जैसे बछड़ा, शरीर के पीछे जैसे शरीर की छाया चलती है, मुक्तजीव भी उसी प्रकार भगवान के साथ पीछे-पीछे चलते हैं। ‘सर्वेषु लोकेषु कामचारी भवति’ उपनिषद् का कथन है कि मुक्तजीव भगवान का ऐश्वर्य देखने की इच्छा से वैकुण्ठ में सर्वत्र एवं अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों में स्वेच्छा से भ्रमण करते हैं।

*एतद्व्रतमित्युक्ततव्रतविपरीतं यत्किंचिदवलम्ब्य व्यावर्तनव्रतमारोप्य तद्दीयमानसंश्लेषरसमेवादृत्याधावमित्युक्तप्रकारेण दीर्घमहाबाहोरप्यविषयतां गत्वा अल्पसारानास्वाद्य विमुखा स्तिष्ठन्ति।

एतद् मम’ ‘यह मेरा व्रत है, इस प्रकार भगवान से कहे गये उनके व्रत के विपरीत जो कुछ थोड़े से विषयों का आश्रय लेकर भगवान से अलग कराने वाले स्वेच्छा से कल्पित व्रतों को अपने ऊपर आरोप करके ‘भगवान् से के प्रदत्त मिलन से होने वाले आनन्द का आदर करके दौड़ रहा था। आलवार की इस उक्ति के विपरीत जीव के साथ आलिंगन करने के लिये फैलाये गये भगवान के लम्बे महाबाहुओं से गिरकर अत्यन्त अल्पसार वाले क्षुद्र विषय समूहों का आस्वादन प्राप्तकर बद्धजीव भगवान से विमुख है रहता है।

टिप्पणी –

७- ‘एतद् मम’-‘सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ।। जो व्यक्ति केवल एकबार मेरी शरण में आकर ‘मैं आपका ही हूं इस प्रकार प्रार्थना करता है। मैं उसे सब भूतों से अभय प्रदान करता हूँ, यही मेरा व्रत है। यह श्रीराम के वचन हैं।

एतेषां नीचस्वभावं दृष्ट्वा परित्यागमकृत्वा स्वाभाविकसम्बधेन हेतुनोपरुद्ध्य संचरत: सर्वभूतसुहृदस्सर्वेश्वरस्य यत्नविशेषः कदाचित् कस्मिंश्चिदवकाशे फलति। तदा (अयं चेतनः) अद्वेषाभिसन्धिमान् मोक्षसमीक्षायुक्तः प्रवर्धमानवैराग्यो विवेकाभिनिवेशी सदाचार्यं समाश्रित्य कृतयज्ञः कृतः परदेवतोद्देशात्मरूपहविस्त्यागात्मको यज्ञो येन सः।

उन जीवों के ऐसे नीच स्वभाव को देखकर भी भगवान किसी को भी नहीं त्यागते हैं। जीव और परमात्मा के स्वाभाविक नौ सम्बन्धों को कारण मानकर बद्धजीवों का त्याग न करके उनके कल्याण के लिये उनके ही सजातीय अवतार (९) ग्रहण कर सर्वत्र विचरने वाले सर्वभूतों के सहृद सर्वेश्वर का परिश्रम विशेषण किसी के लिये एक दिन किसी को एक समय में, किसी को एक अवकाश (१०) पाकर किसी एक जीव के लिये सफल होता है। जिस जीव का कल्याण करने के लिये भगवान् अवकाश पाते हैं, तब उसी जीव के मनमें अद्वेष नामक भाव उत्पन्न हो जाता है और वही मोक्ष के विचार में प्रवृत्त होता है।

टिप्पणी –

८- परमात्मा के साथ जीवात्मा के बहुत से स्वाभाविक सम्बन्ध हैं। उनमें से

‘पिता च रक्षक: शेषी भत्ता ज्ञेयो रमापतिः। स्वाम्याधारोऽयमात्मा च भोक्ता चाद्यमनूदितः ।।’

इस श्लोक के अनुसार पिता-पुत्र, रक्ष्य-रक्षक, शेष-शेषी, भारत-भार्या, ज्ञाता-ज्ञेय, स्व-स्वामी, आधार-धेय, शरीर-आत्मा एवं भोक्तृ-भोग्य ये नौ प्रकार के सम्बन्ध मान्य हैं। इस अर्थ का मूल मंत्र ने बताया है।

९- स्वजातीय अवतार-जिस श्रेणी के जीव आत्माओं के बीच में य भगवान अवतार ग्रहण करते हैं, उस अवतार को स्वजातीय केहा जाता है। राम, कृष्ण, परशुराम का मनुष्य शरीर था, अत: मनुष्य सजातीय अवतार हुये। वामन भगवान का देव शरीर होने से वह देवों के लिये स्वजातीय था। मत्स्य, कूर्म, वराह इनका तिर्यक् शरीर होने से वे तिर्यक् प्राणियों के स्वजातीय अवतार हुए। मुख्य और गौण भेद से भगवान् के अवतार दो प्रकार के हैं। मुख्य अवतारों के सबके देह अप्राकृत थे और वे सब पूर्ण ब्रह्म थे। किन्तु मुक्ति प्राप्ति के लिये गौण अवतारों की पूजा निषिद्ध है।

१०- अवकाश-सम्पूर्ण जीवों के प्रति भगवान की सामान्य शुभ दृष्टि सर्वदा ही है। विशेष कृपा दृष्टि प्रदान करने के लिये भगवान् विशेष अवकाश खोजते रहते हैं। यादृच्छिक, प्रासंगिक, अनुसंगिक नाम अज्ञात सुकृत् ही भगवान का अवकाश है। इस सम्बन्ध में विशेष जानकारी के श्री वचन भूषण ग्रंथ पढ़ना चाहिये।

उसका वैराग्य एवं विवेक के प्रति अभिनिवेश उत्पन्न हो जाता है। उसका फल वह जीव सद्गुरु का शरणागत होकर कृतयज्ञ (११ ) हो जाता है।

कृतकृत्यः संसारक्रौर्यमनुसन्धाय, सर्पास्यग तमण्डूकवत् दावाग्निव्याप्तमृगीवत्, कोटिद्वयावलग्नज्वलनकाष्ठमध्यगतपिपीलिकेव, चको वा सहायो भवतीति तरंगितजलसमुद्रे निमज्जन्नौरिव च व्याकुल:, बहु प्रदर्शयन् व्यामोहयसि, इतः परमपि नाशयसि पंच दिशि दिशि बलादाकर्षन्ति * वस्त्रमन्नं च देहीति बाधन्ते। इतीन्द्रियक्रौर्य स्मरणेनाक्रुश्य, अचिन्त्यं दु:खमुत्पादयति कोऽयं लोकस्वभावः, जीवनाशं दृष्ट्वा न सहामि *

तब वह संसार की क्रूरता का स्मरण करता है एवं सर्प के   सुख में पतित मेंढ़क, अथवा जंगल में चारों ओर लगी दावाग्नि के द्वारा घिरी हिरणी के समान, अथवा दोनों शिरों पर प्रज्ज्वलित लकड़ी के मध्य में स्थित चींटी के समान अपनी अवस्था मनमें सोचकर वह ज्ञानी व्यक्ति अब यहाँ मेरा सहायक कौन है? (भगवान् के अतिरिक्त अन्य कोई सहायक नहीं)

टिप्पणी –

११- कृत्यज्ञ-

विदुः कृष्णं ब्राह्मणास्तत्वतो ये। तेषां राजन् सर्व यज्ञाः समाप्तः।।’ (भारत)

हे राजन्! कृष्ण को जो ब्राह्मण गण यथार्थ रूप से जान गये हैं, उनके समस्त यज्ञ समाप्त हो गये हैं। ऐसी श्रेणी के ज्ञानी व्यक्ति को कृतयज्ञ कहा जाता है, अर्थात् श्रीकृष्ण ही साक्षात् परब्रह्म, सर्वरक्षक, जगत् के प्रधानकारण, परिपालक, सबके सब प्रकार से उपाय आदि हैं इस प्रकार श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में यथार्थ ज्ञान होने पर मुक्ति के लिये उस व्यक्ति को कुछ भी नहीं करना पड़ता। उसकी निर्भरता देख भगवान् प्रसन्न होकर वे स्वयं ही उसे मुक्ति देने को सन्नद्ध रहते हैं।

इस प्रकार चिन्ता करके तरंगों वाले समुद्र में शीघ्र ही डूबन को तत्पर होता है तब व्याकुल होकर नौका के समान के बचाते हो “बहुत प्रकार के विषय दिखाकर मुझे नष्ट काम रहे हो”; “मैं तो आपके शरणागत हुआ।” इसके बाद भी मुझे नाश की ओर ले जा रहे हैं “पंचेन्द्रियाँ आत्मा को चारों ओर जबरन ठेलती हैं”, “वे इन्द्रियाँ-वस्त्र दो, अन्न दो, कहकर दुःख देती हैं”। इस प्रकार इन्द्रियों की क्रूरता का स्मरण कर वह ज्ञानी व्यक्ति विलाप करता है। ये मुझे असंख्य दु:ख देते हैं।

हा हा लोकस्यायं स्वभाव: इति संसारिणां दु:खं द्रष्टुम सहमानः, उन्मत्ता एव मम सर्वेऽपि, लौकिकैस्संगो मम दुस्सहः , लौकिकैस्सह सङ्गमत्यजम् , इत्युक्तरीत्या राक्षसीसहवासासहिष्णु: जानकीव, अनित्यशरीरस्थितिं परमार्थं निश्चित्य अन्नमेव वस्त्रमेव चादृत्य संचरद्भिः शौरिचिन्ता  विमुखैः संसारिभिः सहवासमसहमान:

‘ओह संसार का कैसा भयंकर स्वभाव है’ ‘जीवगण अपनी देह का त्याग करे यह देख कर मुझे सहन नहीं होता है’ ‘ओह, यही संसार का स्वभाव’ इन सम्पूर्ण उक्तियों के अनुसार यह ज्ञानी व्यक्ति संसारी व्यक्तियों के दुःख को सहन नहीं कर पाता ‘मेरे सभी संगी साथी ही प्रमत्त हैं इस उक्ति के अनुसार एवं “लौकिक व्यक्तियों का साथ मेरे लिये कठिन है”। “लौकिक सांसारिक मनुष्यों के साथ का मैंने त्याग किया है”। इन सब उक्तियों के अनुसार जैसे अशोक वाटिका में राक्षसों का साथ सीता देवी को असह्य हुआ था, उसी प्रकार नृत्य शरीर को सत् मानकर एवं अन्न, वस्त्र का (उसके लिये) आदर करके संसार में रहता है, इसी प्रकार भगवान् के चिन्तन से विमुख संसारी व्यक्तियों के साथ रहना इस ज्ञानी व्यक्ति के लिये असह्य होता है।

एतत्स्वभावमितः परं न प्राप्नुयाम् कुत्र त्वां प्राप्नुयाम् दिवसं (त्वत्प्राप्तिकालं) न जानामि परमाकाशं कदा वा प्राप्नुयाम्, इतः परं धर्तुन्न शक्नोमि, आह्वानकाल: इदानीमपि न सन्निहितो भवति इत्यायुक्तप्रकारेण भगवदनुभवालाभेन अत्यन्तं खिन्नः, अग्निसंयुक्तमधूच्छिष्टसदृशः, हा आगत्य दर्शनं देहीत्युक्त्वा शुष्कनेत्राननो भूत्वा, तथापि तददर्शनेन, दिनमेकंकल्पसहस्रं मन्वानः, * प्रायश: पापकारित्वात् मृत्योरुद्विजते जनः। कृतकृत्याः प्रतीक्षन्ते मृत्युं प्रियमिवातिथिम् ।।

तब वह ‘इस प्रकार का सांसारिक स्वभाव मैं फिर से न जाऊँ ‘कहाँ जाकर में स्वयं को प्राप्त करूंगा । उस दिन को मैं नहीं जानता तेजस्वी शरीर को धारण कर परमाकाश वैकुण्ठ में में कब जाऊंगा ‘ ‘इसके बाद में अपने को और अधिक नहीं संभाल सकेंगे’ ‘मुझे बुलाने का समय अब भी निकट नहीं आ रहा है’ इस प्रकार की उक्ति के अनुसार वह ज्ञानी व्यक्ति भगवान् का अनुभव प्राप्त न कर अत्यन्त दुखी होता है एवं अग्नि से संयुक्त मोम के समान उसकी अवस्था होती है। मुझे दर्शन देने के लिये आ नहीं रहे हैं, इस कारण से मेरे नेत्र और मुख सूखे जा रहे हैं।’ इस उक्ति के अनुसार भगवान् के दर्शन न पाकर उस ज्ञानी भक्त को एक दिन एक हजार कल्प के समान प्रतीत होता है।

‘प्रायश: पापकारित्वान्मृत्योरुद्विजते जन:। कृतकृत्याः प्रतीक्षन्ते मृत्युं प्रियमिवातिथिम्।।‘-

पाप करने पर प्राय: पापी व्यक्ति मृत्यु से भयभीत होता है, किन्तु कृतकृत्य व्यक्ति प्रिय अतिथि के समान मृत्यु की प्रतीक्षा करते हैं।’

इत्युक्तप्रकारेण शरीरविमोचनकालं प्रतीक्षमाणः । महिष्युच्छिष्टादर- कृद्राजपुत्रवत् स्वत्यक्तदेहे आदरं कुर्वाणमीश्वरं, नश्यत्विदम् (शरीरम्) इत्यपेक्ष्य,

इस प्रकार जैसे कोई कामी राज (पुत्र) अपनी रानी के उच्छिष्ट (जूठन) को भी आदर से देखो है। उसी प्रकार यद्यपि उसने अपने देहकी माया ममता का त्याग दिया है तथापि भगवान उसके उस रक्त मांस के शरीर को ही आदर करते रहते हैं। यह जानकर वा ज्ञानी भक्त मेरा शरीर नष्ट हो जाय’ इस प्रकार भगवान से प्रार्थना करता है।

श्रिया शापित:, त्वयैव शापित, नेत: परं त्वां विजह्याम्” इत्यवरुद्ध्य यथा प्राप्नुयात् तथा परम भक्तिं प्राप्य, अथवा भक्त्यभिवृद्धि विना विनोक्ति मात्रेऽन्वीय, यद्वा, * मदीयं जन्म नानृतम् यदा विष्णुचित्तार्यः उचितैरुपायैः स्वदेवमाकारयेत्तदा पश्येयम् इत्याद्युक्तप्रकारेण अमोघं सिद्धोपाय मार्ग ज्ञात्वा भागवत सर्प विलक्षण समाश्रयणं  प्राप्य विशदज्ञानोऽर्चिरादिमार्गविरोधिदोषरहितः निर्दोष: तिष्ठति । 

मुझे अनुभव कराया है और जो कुछ है उसका सब लोग अनुभव करें। अनुभव करके अन्तर्हित हो गये, लक्ष्मी की शपथ, स्वयं भगवान की शपथ, देन आपको अब जाने नहीं दूंगा“। श्रीशठकोप आल्वार की इस प्रकार की सम्पूर्ण उक्ति के अनुसार जैसे किसी धनवान व्यक्ति का पुत्र भागने की इच्छा करने पर उसका पिता चारों ओर से उसे रोकता, बाधा पहुंचाता है; उसी प्रकार वह ज्ञानी भक्त भी परमभक्ति के वश में होकर, मैं सब प्रकार से बाधा देकर भगवान को अपनी चेष्टा से ही जानकर अनुभव करूंगा। इस प्रकार मनमें भावोदय होने पर प्रेम से उन्मत्त हो पड़ता है। श्री लोकाचार्य स्वामी जी मुक्तिलाभ में भक्तियोग नामक उपाय की उत्पत्ति और वृद्धि क्रम का वर्णन करके इसके बाद शरणागति का वर्णन करते हैं अथवा भक्तियोग का मार्ग त्याग करके भी गीता के-सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।। इस श्लोक में भगवान ने जो कुछ कहा है महाविश्वास पर्वक उसी वाक्य का सहारा लेकर मैं जिस स्थान पर हूँ वहाँ से अन्यत्र नहीं जाएंगे, ‘वे मेरे पिता और गुरु श्री विष्णुचित्त स्वामी (आलवार) उनके इष्टदेव आपको यदि बुलायें तब में आपके दर्शन करुँगी‘ श्रीगोंदा देवी ऐसी भक्ति में ही जिस कारण से मौजूद हैं. लगी हैं. उसी अव्यर्थ मार्ग पर स्थित किसी विलक्षण परम भागवत का आश्रय प्राप्त कर जीवात्मा का स्वरूप ज्ञान अर्जन करके निर्दोष भाव से संसार में रहना होगा।

१२- भक्तियोग और शरणागति ये मुक्ति के दो विभिन्न मार्ग हैं। भक्ति में जीव की प्रवृत्ति प्रयोजन है, इसलिये भक्ति प्रवृत्ति साध्य है। किन्तु शरणागति में महाविश्वास पूर्वक जीव की निवृत्ति प्रयोजन है। अतएव शरणागति जीव की निवृत्ति साध्य है। ‘जन्मान्तरसहस्रेषु तपोध्यानसमाधिभिः । नराणां क्षीणपापानां कृष्ण भक्तिः प्रजायते।। इस प्रमाण के अनुसार जब बहुतसे जन्मों तक वर्णाश्रम अनुकूल शास्त्रीय कर्म करके निष्पाप होने पर तब जीव भक्तियोग का अधिकारी होता है। भक्ति करते समय भी वर्णाश्रम धर्म का पूर्णरूप से परिपालन करना आवश्यक है। इसके साथ-साथ ध्यान, स्तुति, प्रणाम, अर्चना आदिं भी करने चाहिए। इस प्रकार भक्ति को चेष्टा द्वारा बढ़ाकर भक्ति की पराभक्ति नामक सीमा में उपस्थित होकर तब भगवान के दर्शन और मुक्ति प्राप्त होती है चेष्टा का त्याग करने से भक्ति नष्ट हो जाती एवं फल का लाभ भी नहीं होता है। मन की एकाग्रता या समाधि, प्रेम भगवत दर्शन और मोक्ष ये निष्काम भक्ति के अवश्यंभावी फल हैं। भक्तों को अन्तिम समय स्मृति की अवश्य आवश्यकता है। अन्तकाल भगवान की स्मृति न होने से, जैसी स्मृति होगी वैसी ही गति होगी। इसका दृष्टान्त राजा भरत है। उन्होंने हरिणशावक को स्मरण करते हुए देहत्याग किया, अत्त. उन्हें हरिण होना पड़ा। भोग के द्वारा प्रार्ध के भोग सम्पूर्ण नष्ट होने पर तब भक्त संसार से मुक्त होता है। भोग यदि कुछ भी बाकी है तब उन भोगों के कारण फिर से दूसरी देह ग्रहण करनी पड़ती है। भक्ति भक्तों की चेष्टा-सापेक्ष होने से भक्त का भार भक्त के ऊपर ही रहता है। शरणागत को भक्ति की अपेक्षा आत्मा के स्वरूप ज्ञान का अधिक प्रयोजन है। वेदोक्त भक्तियोग में स्त्रियों एवं शूद्र जाति का अधिकार नहीं है।

भक्ति मोक्ष का उपाय एवं स्वाभाविक भी हो सकती है। जड़भरत, प्रहलाद, ध्रुव ये सब उपाय भक्ति के अधिकारी थे। भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, नन्द, यशोदा, देवकी, वसुदेव, ब्रज के गोप-गोपीगणों की भक्ति स्वाभाविक थी। वो स्वाभाविक भक्ति के अधिकारी थे। भगवान हमारे शेषी, स्वामी, नियन्ता, अन्तरात्मा, सब प्रकार से उपाय, रक्षक, आधार इत्यादिक सर्वस्व एवं मैं भगवान् का शेष, दास, शरीर, परतन्त्र, रक्ष्य, आधेय इत्यादि हूँ, इस प्रकार भगवान के साथ अपना स्वाभाविक सम्बन्ध ज्ञान प्राप्त कर उसमें दृढ़ अध्यवसाययुक्त होने का नाम शरणागति है। यह अध्यवसाय ही जीव के स्वरूप का संशोधक, उसको निर्मल बनाने वाला होता है। इस सम्बन्ध का ज्ञान दृढ़ होने पर स्वाभाविक भगवद्रभक्ति भी स्वत: आकर उपस्थित हो जाती है। सीता जी और लक्ष्मण जी, भरतजी ये जिस प्रकार शरणागतों में श्रेष्ठ आदर्श थे, जैसे भक्तों में भी शिरोमणि थे। आलवार गण सब शरणागति मार्ग के पथिक थे। वैसा होने पर भी उनके समान भक्त अति दुर्लभ है ऐसा कहा जा सकता है। शरणागत के लिये अन्तिम स्मृति की आवश्यकता नहीं होती। अन्तकाल में भगवान् ही उसकी रक्षा करते हैं। प्रारब्ध के भोग शेष रहने पर भी उनके लिये उस भक्त का पुनर्जन्म नहीं होता है। भगवान् क्षमा शक्ति से उन बाकी अंश को नष्ट कर देते हैं कीर्तन, अर्चन, स्तुति आदि के द्वारा भक्त को जीवनदशा में आनन्द अधिक अपेक्षित होता है। इसी कारण से भक्त की अपेक्षा शरणागत को भगवत्प्राप्ति अधिक शीघ्रता से होती है श्रीलोकाचार्य जी के मत से किसी विलक्षण परमभागवत के अधीन हो, उसका संग कुछ काल तक करना शरणागत के लिये अनिवार्य नियमित है, ऐसा होने से स्वरूप अधिकतर निर्मल होता है। यह विषय श्रीवचनभूषण में द्रष्टव्य है। स्वयं को स्वतंत्र मानकर किसी उपाय विशेष में प्रवृत्त होना अन्य किसी देवतान्तर के शरणापन्न होना, शरीर और आत्मीय बन्धुओं के प्रति अत्यधिक माया ममता, भगवत्प्राप्ति की आशा न कर अन्य किसी की आशा करना इत्यादि ये ही शरणागत के दुर्गुण एवं भगवत्प्राप्ति के रोकने वाले (प्रतिबन्धक) हैं इन सबके त्याग पर ही शरणागत निर्दोष होता है।

अस्य शरीरावसानकाले सर्वेश्वरः, यदाऽयं त्वं स्वचरण नतमस्तक तदा प्रभृति ऋणं प्रवृद्धमिव|

मद्दासानां किं कुर्यामित्येव प्रतीक्षमाणो वर्तसे। इत्यायुक्त प्रकारेण प्रत्युपकारमन्विष्य कमप्यलभमानः किं कर्तव्यतामूढः कैंकर्यं स्वीकर्तुं निश्चित्य उन्मूलितदन्तसर्पवत् संसारस्य अपुनरंकुरं मूले छिन्नेऽपि शवोऽप्युत्थाय दशति किमित्यतिशंकया उचितदेशं गमयितुं कृतनिश्चयः तदर्थं त्वरन्,

इस प्रकार शरणागत के देह त्याग करने का समय आने पर वह जिस दिन भगवान के शरणागत हुआ था, उसी दिन से ‘ऋणम् प्रवृद्धमेव’-बढ़ते हुए ऋण के समान एवं ‘मैं अपने दास के लिये कर आप (भगवान) इस प्रकार चिंतित रहते हैं। इस सम्पूर्ण भक्ति के अनुसार ‘महान् ऋण और भी अधिक हो गया’ इस तरह मनमें सोचकर । एवं ‘इस व्यक्ति ने मेरे शरणागत होकर मेरा महान उपकार किया है’ इस भाव से स्वयं को ही उपकृत मानकर शरणागत से किये उपकार के योग्य प्रत्युपकार खोजने पर भी न पाकर तो भगवान मन में सोचते हैं वैकुण्ठ में इसके द्वारा की गई नित्यसेवा को मैं वहीं स्वीकार करूँगा ‘ यह निश्चय कर जैसे सर्प के विषैले दाँतों को तोड़ देने पर उसका विष नहीं निकलता, वैसे ही ‘संसार का अंकुर भी नहीं रहता, इसीलिये संसार-बन्धन रूप मूल का उच्छेदन करने की भगवान इच्छा करते हैं, वैसा होने पर भी जैसे के कोई मृत शरीर को देखकर ‘यह शव उठकर मुझे कही काट न ले’ इस प्रकार लोग अत्यन्त शंकित होते हैं उसी प्रकार इस ज्ञानी मुमुक्षु शरणागत को संसार में रखने से संसार का सान्निध्य होने के कारण नाना प्रकार के सांसारिक दुर्गुण इस पर आक्रमण करेंगे’ इस प्रकार अत्यन्त शंकित हो भगवान उसे संसार मण्डल की सीमा के बाहर पार्षदों के रहने योग्य वैकुण्ठलोक में साथ लगाकर ले जाने के लिये दृढ़ संकल्प करते हैं।

एतस्याभिनिवेशो यथा गोष्पदे स्यात् तथा महाभिनिवेशशाली, क्षणकालमपि विलम्बमकुर्वाण: 

भगवान के चरण प्राप्त करने के लिये भक्त के अभिनिवेश का परिश्रम मानों गोष्पद (गाय के खुर से बना गड्डा) है और उक्त भक्त को वैकुण्ठ ले जाने के लिये भगवान के अभिनिवेश का परिश्रम मानो समुद्र है, उसी प्रकार भगवान का अभिनिवेश अत्यन्त संवर्धित होता है एवं तब से उस भक्त का भगवान एक क्षण के लिये भी त्यागकर दूर नहीं रहते हैं।

यथा चक्रवर्ती वसिष्ठवामदेवादीनाहूय तैस्साकं स्वतनूजाभिषेकविषयकं मनोरथमाविश्चकार, तथा नित्यसूरीनाहूय मार्गमलंचिकीर्षुः, 

श्री रामचन्द्र जी के राज्याभिषेक के समय महाराज दशरथ जैसे वशिष्ठ, वामदेव आदि को बुलाकर उनके द्वारा अभिषेक कराने में प्रवृत्त हुए थे, उसी प्रकार श्री वैकुण्ठ नाथ भगवान भी वैकुण्ठ स्थित पार्षदगण को बुलाकर वैकुण्ठ जाने के मार्ग का श्रृंगार कराने के लिये ‘दशरथ महाराज अपने महल में अलंकारों की समस्त विधि संपन्न कराये है श्री रामायण की इस उक्ति के अनुसार भगवान अपने पार्षदों को वैकुण्ठ का श्रृंगार करने के लिए आदेश देते हैं।

अलंकारविधिंकृत्स्नं कारयामास वेश्मनि। इत्युक्तरीत्या गृहमलंकृत्य, अनादिकालोपार्जितानि एतत्कृताचार्यसमाश्रयणकालप्रभृतिप्रतिहतशक्तिकतया विनष्टकल्पस्वरूपाणि क्वचित्कोणे निलीनानि कर्माणि अनुकूलविषये प्रतिकूलविषये च, वरुणमुद्दिश्य चापे आरोपितं शरं मरुकान्तार इव संक्रमय्य नरके पति जाने तत् सम्बन्धिनः, एतत्सम्बन्धिनश्चान्ये स्वर्गस्थाः प्रभवन्ति ते इत्युक्तप्रकारेण स्वर्गस्थान् करवाणीति संकल्प्य, 

जैसे किसी व्यक्ति के मस्तक और मुख दण्ड के द्वारा भयंकर आघात करने से उस व्यक्ति की कछ ही करने की शक्ति ही नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार उस मामा शरणागत के अनादिकाल से मुक्ति के विरोधी पाप पुण्य ने जो किया एवं गुरु का आश्रय प्राप्त करने के बाद भी प्रमादवश जो कुछ किया भगवान उन कर्मों के फल देने की शक्ति को ही नष्ट कर देते हैं, ऐसा होने से उन कर्मों का स्वरूप ही नहीं रहता है। जैसे श्रीराम ने वरुण देव को मारने के लिये धनुष पर आरोपित ब्रह्मास्त्र को मारवाड़ प्रदेश में फेंक दिया था, वैसे ही ‘श्री वैकुंठनाथ भगवान समीप में विद्यमान रहने पर भी दिखाई नहीं देते’ इसी प्रकार मौजूद उन शरणागत के पूर्वाध और उत्तर्राघ नामक दोनों श्रेणी के पापों को उस शरणागत व्यक्ति के अनुकूल (प्रिय) और प्रतिकूल (वैरी) व्यक्तियों में बाँट देते है स्वयं भगवान । अर्थात् उस शरणागत व्यक्ति की जीवदशा में जो लोग उसके अनुकूल थे उन्हें उनकी पुण्य कर्म एवं जो लोग उसके प्रतिकूल थे उन्हें उस शरणागत के पापकर्म देकर उसे पाप-पुण्य रहित कर देते हैं। इसके बाद उसके शरीर सम्बन्धी. निकट आत्मीय जन जो नरक में पड़े है उन्हें देवता के समान स्वर्ग में पहुँचाने का संकल्प करते हैं।

ऊड: पंचात्मना तेन ताक्ष्यरूपेण इति मुदितं पक्षिणं स्वयमारुह्य संचरति * इत्याधुक्तप्रकारेण कृपासागरं पक्षिणं (मत्पुरतः) संचारय इत्याद्येतदीयप्रार्थनानुसारेण गरुत्मन्त मारोहन्नाविर्भूय सुवर्णपर्वताधिरूढमहामेघसदृशं स्वदिव्यमंगलविग्रहमनुभाव्य, आतिवाहकानाहूय, एतस्य सत्कारक्रमविशेषाना ज्ञाययति ।

पंचात्मा गरुड़ पक्षी भगवान को वहन करते है’; आनंदित गरुड़ पक्षी के ऊपर स्वयं भगवान श्रियःपति विराजकर विचरण करते हैं’। इस उक्ति के अनुसार एवं ‘दयामुद्र गरुड़जी को मेरे पास लायेंगे क्या?’ भक्त की इस आशा के अनुसार भगवान् गरुड़ पर चढ़कर प्रकट होकर स्वर्णवर्ण के पर्वत की चोटी पर एकत्रित काले मेघ के समान अपने दिव्य विग्रह का अनुभव मुक्तात्मा को प्रदान करते हैं। इसके बाद आतिवाहक नामक देवों को बुलाकर सत्कार करने के क्रमानुसार उस महात्मा का सत्कार करने का आदेश स्वयं भगवान् देते हैं। इसके बाद

ततः इन्दियैर्मनसि सम्पद्यमानैर्वांङ्मनसि । सम्पद्यते, मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेज: परस्यां देवतायाम् {प्र. उप. ३९}इत्युक्तप्रकारेण अस्य बाह्यकरणानि अन्तःकरणे लीयन्ते, (समीपं प्राप्नोति) अन्तःकरणं प्राणे, प्राण: अस्मिन् चेतने, चेतनो भूतसूक्ष्मविशिष्ट: परमात्मन्येकीभवति। 

इन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमान:वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणः तेजसि तेजः परस्यां देवताम्’

मन इन्द्रियों के साथ, वाक् इन्द्रिय मन के साथ, मन प्राण के साथ प्राण पर देवता के साथ मिल जाते हैं।

श्रुति की इस उक्ति के अनुसार बाह्येन्द्रिय सभी अन्त:करण में लीन हो जाती हैं, मिल जाती हैं। अन्त:करण प्राण में, प्राण तेज में और तेज संयुक्त जीवात्मा में लीन हो जाता है।

अनन्तरं यथा धर्मकाले रविकिरणतप्तः सच्छायं वृक्षमाश्रित्य शान्तश्रमो भवति तथा संसारदु:खतप्तोऽयं वासुदेव तरुच्छायामाश्रित्य शान्तश्रमो भवति।

बाद में ग्रीष्मकाल में सूर्यकिरणों से तृप्त व्यक्ति घनी छाया वाले वृक्ष का आश्रय प्राप्तकर जैसे उसके शरीर का उत्ताप शान्त हो जाता है, वैसा ही संसार रूपी सूर्य के ताप से सन्तप्त वह ज्ञानी मुझे जीव वासुदेवरूपी वृक्ष की छाया का आश्रयण कर विश्राम प्राप्त करता है।

तिरुक्कोवलूरुगमनसमये श्रीपरकालसूरिण: स्वाभिमत दिव्यदेशे सर्वेष्वपि स्वचरणौ गीत्वा इत्युक्तप्रकारेण लोकविक्रान्तचरणौ यथा पाथेयमभूतां तथा,

* प्राणप्रयाणपाथेयम् *  पाथेयं पुण्डरीकाक्षनामसंकीर्तनामृतम् इत्युक्तप्रकारेण द्वयोच्चारणं पाथेयं भवति। 

श्रीपरकाल आलवार के तिरुक्कोवलूर नामक दिव्य देश में जाते समय ‘समस्त प्रिय दिव्य देशों में (जाते समय) आपके दोनों चरणों का कीर्तन करके‘ इस उक्ति के अनुसार त्रिलोकी का अतिक्रमण करने वाले (वामन) मार्ग के दोनों चरण जैसे उनके पाथेय बने थे उसी प्रकार एवं पुण्डरीकाक्ष भगवान का नाम संकीर्तन रूपी अमृत ही पाथेय होता है’ इस उक्ति के अनुसार उस ज्ञानी समस्त शरणागत का द्वयमन्त्रोच्चारण (जप) ही होता है-वैकुण्ठ यात्रा का पाथेय।

एतेन प्रतिपद्यमाना: देवयानपथास्सर्वे मुक्तिमार्गाभिलाषिण: इत्युक्तप्रकारेण अर्चिरादिमार्ग एव महामार्गो भवति।

जो जीव मुक्तिमार्ग में जाने की इच्छा करते हैं वे इस देवयानमार्ग से यात्रा करते हैं। इस उक्ति के अनुसार अर्चिरादि-मार्ग ही उनका महामार्ग है।

अण्डा बहिर्गमयिता स्वामी आप्ततमश्शेषशायी कुटिलालक पुण्डरीकाक्षः बिम्बाधर कालमेघ श्रीरंगनिलयस्सहायभूत इति स एव मार्गसहायो भवति; विरजातीरं तिल्यवृक्षः आरम्हदतटश्च विश्रामस्थलं भवति। श्रीमहामणिमण्डप एव गन्तव्यस्थानं भवति, अर्चिरादिपुरुषा एव संल्लापसहायाः। व्याप्ताभ्रध्वनिरेव प्रयाणपटहध्वनिर्भवति। प्रीत्या मार्गप्रदेनास्मद्देवेशेन हार्दैनानुगृहीतं मार्ग प्राप्य गमने सन्नद्धः प्रीत्यतिशयेन अनादिकालमारभ्य स्व विषये अक्रूर संसारम्

स्वामी, आप्ततम, शेषशायी, घुंघराले केशवाले, पुण्डरीकाक्ष, बिम्बाघर, कालमेघ श्रीरंगवासी भगवान ही ब्रह्माण्ड के बाहर भी ले जाने में सहायक हैं। यह कहने से नारायण ही मार्ग में सहायक होते हैं। विरजा नदी का तट, तिल्यवृक्ष, आरंहद ये मार्ग के विश्राम स्थान हैं। महामणिमण्डप ही मुक्तात्मा का गन्तव्य स्थान है, अर्चिरादि  पुरुषगण (आतिवाहक नामक देवगण) मार्ग में वार्तालाप में सहायक होते हैं। आकाश में सुशोभित व्याप्त मेघों की ध्वनि ही यात्रा के आरम्भ में बजने वाले नगाड़ों की ध्वनि होती है।

नरकं ह स चित्तेत्युक्तप्रकारेण परावृत्य प्रश्यन् हसन् महावैकुण्ठं द्रष्टुं पूर्वमेव विद्यामानायामाशायामुपर्युपरि वर्धमानायाम्, श्रीजानकी विभीषणश्च लंकाया इव हृदय कमलान्निष्क्रम्य। 

हमारा ईश्वर ही मार्ग दर्शक है‘ हमारे हृदयवासी अन्तर्यामी भगवान ही पथप्रदर्शक होते हैं। अनादिकाल से संसार मेरे साथ क्रूरता का व्यवहार करता आया है, यह मन में सोचकर ‘हे मन! नरक रूपी संसार का परिहास करो इस कथन के वह महात्मा जीव आनन्द की अधिकता से पीछे मुड़कर संसार को देखकर ‘तू क्या कर सकेगा’ उसकी हँसी करता है। पहले से ही विद्यमान महावैकुण्ठ देखने की आशा बढ़ती रहती है। रावण वध बाद श्रीजानकी जी एवं विभीषण प्रभु श्री राम जी के पास जाने के लिये जैसे लंका से बाहर हुए थे, उसी तरह से मुमुक्षु ज्ञानी शरणागत जीवात्मा हृदयकमल से बाहर निकलता है।

शतंचैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिस्सृतैका। इयुक्तप्रकारेण हृदयाश्रितास्वेकाधिकशतसंख्याकासु

नाडीषु सुषुम्ना नामकया मूर्धन्य नाड्या विद्यामाहात्म्येन देवयानानुस्मृत्या च प्रसन्ने हार्दे मार्गं द्योतयति गत्वा शिरःकपालं भित्वा, आसु नाडीषु सृप्ताः आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः…….

‘अथैतैरेव रश्मिभिर्ध्वम् आक्रमते (छान्दोग्य ० ८ ।६ ।५ ।)

इत्युक्तप्रकारेण तन्नाड्या सम्बन्धः, आदित्यरश्मिमनुसरन्, ॐ काररथमारुह्येत्युक्त प्रकारेण प्रणवरथमारुह्य मनस्सारथिर्गछति। 

तदा कैष्यारुशक्करदशके दिवस इव ‘सर्वावयका जातमिव’ उभयविभूतिरपि नवनवं भासते, समुद्रः स्वगाम्भीर्यं सर्वं विहाय उन्मृत्तिकं कलुषीभूय नृत्यति ऊर्ध्वलोकस्थास्सर्वेऽपि-उपहारपाणयो महान्ति तोरणानि बद्ध्वा सर्वमप्याकाश अवकाशं पूर्णकुम्भपूर्णं कृत्वा धूपपुष्पाणि वर्षन्ति । अयं कदाचिद स्थित्वा गच्छेदित्याशया पुरतो देवेषु वासस्थानं कल्पयत्सु, सर्वलोकपंथ (कम्पं) घोषेषु समुद्रेष्विव महाघोषास्समुद्रा इव वाद्येषु वाद्यमानेषु, मार्गस्थेषु सर्वेषु मदीयं पदं स्वीक्रियतामिति स्वस्थानानि ऐश्वर्य च समर्पयत्सु, केषुचिद्गीतानि गायत्सु, केषुचिद्ज्ञादि सुकृतफलान्यर्पयत्सु, अन्येषु केषुचित् धूपादिना अर्चयत्सु, केषुचित् काहलशंखादीन् वादयत्सु  अतिकान्तिमन्नयनासु-आतिवाहिकमहिषीषु इदमराजकं माभूत, एतत्पालय’ इति मंगलाशासनं कुर्वन्तीषु मरुत्सु वसुषु च अयं त्वरयागच्छति चेत् ईश्वरेण अस्मदधीनं कृतं कार्यं निर्वर्तितं भवेदिति-अनिवृत्य अस्मदरधीनं कृतं लोकान्तरेषु चानुसृत्य तच्छोत्रगोचरं स्तुवत्सु, अन्येषु सर्वेषु चांजलिं कुर्वत्सु महता सत्कारेण गच्छति, तदा च अर्चिषमेवाभिसंभवन्ति अर्चिषोऽह: अह्न आपूर्यमाणपक्षम् अग्निज्योतिरहश्शुक्ल: षण्मासा उत्तरायणम् इति छान्दोग्य वाजनेयकौषीतकिप्रभृति षूक्तप्रकारेण अर्चिरादिपुरुषेषु मार्गप्रदर्शयत्सु अयं गच्छति।

शतं चैका च हृदयस्य नाड्य:’-हृदय की नाड़िये की संख्या एक सौ एक हैं। उन सब में सुषुम्ना नाड़ि (मूर्धन्य नाड़ी) से गये शरणागति की महिमा एवं देवयान  मार्ग की सर्वदा अनुस्मृति के लिये प्रसन्न हृदयवासी परमात्मा (अन्धकार में रास्ता दिखाने के लिये) हाथ में दीप लिये जाने वाले के अनुसार आगे-आगे चलते हुए उस मुमुक्षु जीव की आत्मा के सिर:कपाल अर्थात् मस्तक के उपर भाग में सहस्रार चक्र को भेदन कर ‘तासु नाडीषु सृप्ताः आक्रमते‘ उन्हीं नाड़ियों के साथ मिलकर उन नाड़ियों क साथ आदित्य मण्डल में उपस्थित होता है।

‘अथैतैरेव रश्मिभिर्ध्वम् आक्रमते (छान्दोग्य ० ८ ।६ ।५ ।)

सूर्य के किरणों के साथ ऊपर की ओर जाता है‘।

इस श्रुति वाक्य के अनुसार वह मुमुक्षु जीवात्मा सुषुम्ना नाड़ी के साथ सम्बद्ध सूर्यरश्मियों का अनुसरण करता है। ‘ओंकार रथमारुह्य ‘ ओंकार (प्रणव) रथ पर चढ़कर मन को  सारथी  करके ऊपर जाने के समय सहस्त्रगीति  के कैष्यारु दशक वर्णन अनुसार श्रीशठकोप आलवार का जैसे समस्त अंग प्रत्यंग नवीन रूप से अनुभूत हुआ था, उसी प्रकार उस मुमुक्षु चेतन को भी भगवान की नित्य विभूति और लीलाविभूति इन दोनों विभूतियों का नवीन-नवीन रूप से अनुभव होता है। उस समय समुद्र अपने तल में स्थित मिट्टी को ऊपरी भाग में लाकर संभ्रम के साथ नाचने लगता है। ऊपर देवलोक में स्थित देवगण अपने हाथों में भेंट की सामग्री लेकर विशाल तोरणों का निर्माणकर समस्त आकाशको पूर्णकुम्भों से पूर्ण कर देते हैं और घूप, पान दीप, पुष्प वर्षा करते रहते हैं, यह मुक्तात्मा कुछ समय तक यहाँ रहकर बाद में आगे जाये, इस आशा से देवगण स्थान-स्थान पर आवासों का निर्माण करके तैयार रखते हैं। सब लोकों को कम्पित करने के समान समुद्रगर्जन के सदृश देवगण बाजे बजाते हैं। उस मुमुक्षु महात्मा के ऊर्ध्वगमन के समय मार्ग में स्थित देव समुदाय हमारा स्थान आप ही ग्रहण करिये-यह कहकर अपने-अपने पुण्य लोक एवं ऐश्वर्य उसे अर्पित करने की प्रार्थना करते हैं। कोई-कोई तो आनन्द में गाने लगता है। कोई-कोई अपने अपने द्वारा किये पुण्य कर्मों का फल उसे देने के लिये प्रार्थना करता है, कोई देव उस मुक्तात्मा की धूप, दीप से अर्चना करता है। कोई देव शंख, काहलि आदिक बजाते हैं, अतिवाहक देवगणों की अतिसुन्दर नेत्रवाली देवियां हमारा यह स्थान मानो अराजक न हो इसलिये आप यहीं पर रहकर हमारा पालन करें यह कहती हुई मंगलाशासन करती हैं। उस महात्मा के द्वारा ऊपर जाते समय उनतालीस मरुद्गण, अष्टवसु आदिक देवगण, इनके (मुक्तात्मा के) द्वारा इधर से जाने से परब्रह्म परमात्मा नारायण हमारे पुण्यलोकों को जबरन हम से नहीं छिनेंगे, हमारे लोक हमारे ही बने रहेंगे, यह सोचकर निर्भय हो अपने-अपने लोक की ऊपरी सीमा पर्यन्त जाकर और वहाँ से न लौटकर उसी मुक्तात्मा का अनुसरण कर अन्यान्य लोकों में भी देवगण पीछे-पीछे जाते हैं। उस समय वे परब्रह्म के निकट अपनी-अपनी प्रार्थना सुनाने के लिये हाथ जोड़े उस मुक्तजीव से निवेदन करते हैं। इस प्रकार अत्यन्त सत्कार पाकर वह जीवात्मा आगे बढ़ता है।

“तेऽरचिषमेवाभिसंभवन्ति…..आपूर्यमाणपक्षम्

मुमुक्षु जीवात्मा प्रथम अर्चि अर्थात अग्नि लोक में जाता है, वहाँ से दिनाभिमानी देवलोक में होकर शुक्ल पक्ष अभिमानी देवों के लोक में जाता है। ‘अग्नि ज्योति: शुक्ल: षड्मासा उत्तरायणम् ‘ (गीता) इसी प्रकार छान्दोग्य, वृहदारण्यक, कौषीतक आदि उपनिषद् एवं गीता प्रभृति शास्त्रोक्त प्रकार से आतिवाहिक देवतागण आगे आगे मार्ग दिखाते हुए जाते हैं और उनके पीछे मुक्तात्मा जाता है। ।।

अर्चिरादिमार्गका प्रथमप्रकरण सम्पूर्ण हुआ।।

। इत्यर्चिरादी प्रथमं प्रकरणम्।।

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Published by ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

One thought on “प्रथम प्रकरण (हिन्दी अनुवाद)

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