अर्चिरादि सार


श्रीवरदगुरुविरचितप्रातरनुसंध्येयश्लोकद्वयम् ।

सत्संगाद्भव निःस्पृहो गुरुमुखाच्छ्रीशं प्रपद्यात्मवान् प्रारब्धं परिभुज्य कर्मशकलं प्रक्षीणकर्मान्तरः।
न्यासादेव निरङ्कुशेश्वरदयानिनमायान्वयो हार्दानुग्रहलब्ध मध्य धमनी द्वारा बहिनिर्गतः।।१।।

मुक्तोऽर्चिर्दिनपूर्वपक्षणडुदङ्मासाब्दवातांशुमद् ग्लौविद्युद्वरुणेन्द्रघातृमहितः सीमान्तसिन्ध्वाप्लुतः। श्रीवैकुण्ठमुपेत्य नित्यमजडं तस्मिन् परब्रह्म: सायुज्यं समवाप्य नन्दति चिरं तेनैव धन्यः पुमान् ।।२।।

प्रातर्नित्यानुसंध्येयं परमार्थ मुमुक्षुभिः ।
श्लोक द्वयं संक्षिप्तं सुव्यक्तं वरदोऽब्रवीत् ।।

मोक्ष की इच्छा रखने वाला पुरुष भगवद् भागवत आचार्य कैंकर्य परायण सज्जनों के सहवास से सांसारिक विषय सुखों से निस्पृह (इच्छा रहित) हो जाता है। इसके बाद वह प्राणी अष्टाक्षर मन्त्र के उपदेश देने वाले सदाचार्य के श्रीमुख से श्रीमन्नारायण की शरणागति करके आत्मवान् होता है अर्थात् स्वस्वरूप, परस्वरूप, उपाय स्वरूप फलस्वरूप, विरोधिस्वरूप, अर्थपंचक ज्ञानवाला होता है इसके बाद प्रारब्ध कर्म, संचित, कियमाण आदि अनेक कर्मों के रहते हुए प्रारब्ध कर्म के खण्डों को सम्पूर्ण रूप से यहीं भोगकर नष्ट करता है। संचित और क्रियमाण कर्मों को सर्वतन्त्रस्वतन्त्र सर्वेश्वर अपने शरणागतों पर अपनी निर्हेतुक दया करके मूल सहित नष्ट कर देते है।

तदनन्तर जब उस शरणागत प्रपन्न मुमुक्षु चेतन के शरीर त्याग करने का समय आता है, तब वह जीव अपने अन्तर्यामी भगवान् का अनुग्रह प्राप्त कर सुषुम्ना नाड़ी से द्वारदेश के बाहर निकलता है। इसके बाद वह मुक्तात्मा देवयान मार्ग से जाते समय अच्छी अभिमानी, दिन अभिमानी, शुक्लपक्ष अभिमानी, उत्तरायण के छः माह अभिमानी एवं वर्ष अभिमानी उन उन स्थानों के रहने वाले देशों को प्राप्त करता है। इसके बाद वायु, सूर्य, चन्द्रमा, विद्युत, वरुण, इन्द्र, प्रजापति के अभिमानी देवों को क्रमश: प्राप्त करता है और उन सब देशों से वह मुक्त जीव पूजित एवं संस्कृत होता हुआ प्रकृतिमण्डल की सीमा के अन्तभाग में स्थित अर्थात् लीलाविभूति (प्रकृतिमण्डल) और त्रिपा विभूति (वैकुण्ठ धाम) इन दोनों भगवद् विभूतियों की सीमारूप विरजा’ नाम की नदी में स्नान करते ही सूक्ष्मशरीर (लिंग शरीर) का परित्याग कर देता है। विरजा के उस पार स्थित मानव नामक भगवान के हाथ का स्पर्श प्राप्त होते ही उस जीव की वासना भी समाप्त हो जाती है। तब वह जीव पंचोपनिषन्मय अप्राकृत भगवत्सेवा के लिये उपयुक्त दिव्य देह प्राप्त कर लेता है।

इस प्रकार वह दिव्यात्मा मुक्त जीव नाश रहित, स्वयं प्रकाश श्रीवैकुण्ठ नामक दिव्यनगर में क्रमश: जाकर उपस्थित होता है। वैकुण्ठ को साष्टांग करता है, वहाँ उस दिव्य देश में परब्रह्म परमात्मा श्री लक्ष्मीनारायण का सारूप्य (भगवान के सामान रूप) एवं सायुज्य (भगवान् के समान गुणों) को प्राप्तकर उन्हीं सर्वेश्वर श्री लक्ष्मी नारायण भगवान के नित्य कार्य परायण हो धन्य-धन्य एवं कृत्कृत्य हो जाता है। तब वह जीव अनन्तकाल तक भगवत्सेवा सुख रूप आनन्द में निम्न हो आनन्दवान् होता मुमुक्ष चेतनों को, परम अर्थ को संक्षेप में व्यक्त करने वाले इन दो श्लोकों का प्रात:काल प्रतिदिन अवश्य अनुसंधान करना चाहिये यह श्रीवरदगुरु ने कहा है। है।

पं० केशव देव शास्त्री, वृन्दावन

Published by ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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