ईशोपनिषद् 12

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद् वरवरमुनये नमः

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते।

ततो भूय इव ते तमो य उ संभूत्यां रताः ॥१२॥

पदविभाग

अन्धम् तम: प्रविशन्ति  ये असंभूतिम् उपासते ततः भुय: इव ते तमः उ संभूत्याम् रताः

अन्वयार्थ-

( ये ) जो ब्रह्मविद्या के अधिकारी ( असंभूतिम् ) समाधि के अङ्गभूत मान, दम्भ, हिंसा आदिक निषिद्धों की निवृत्ति को ( उपासते ) अनुष्ठान करते हैं वे ( अन्धम् ) अतिगाढ ( तम:) अन्धकार को ( प्रविशन्ति) प्रवेश करते हैं और (ये) जो लोग () निश्चय करके ( संभूत्याम् ) समाधिरूप संभूते में ही (रताः) तत्पर रहते हैं (ते) वे समाधिरत (ततः) योगविरुद्ध निवृत्तिरूप असंभूति की उपासकों के प्राप्य अतिगंड अन्धकार से (भुय:) अधिकतर के (इव) समान (तमः) अन्धकार को प्राप्त करते हैं ॥१२॥

विशेषार्थ-

जो ब्रह्मविद्या के अधिकारी समाधि के अङ्गभूत मान, दंभ, हिंसा, स्तेय आदिक योगविरुद्धों की निवृत्ति रूप असंभूति की उपासना या अनुष्ठान करते हैं वे अतिगाढ़ अन्धकार को प्रवेश करते हैं अर्थात् कूकर, शूकर आदि योनियों में जन्म लेते हैं और जो लोग समाधिरूप संभूति में तत्पर रहते हैं वे समाधिरत योग- विरूद्ध निवृत्तिरूप असंभूति के उपासकों को प्राप्य अतिगाढ अन्धकार शूकरादिक योनि से भी अधिकतर के समान अन्धकार को अर्थात् कृमि, कीट आदिक योनि को प्राप्त होते हैं

अथवा

जो लोग ‘असंभूति’ विनश्वर शरीर की केवल उपासना करते हैं अर्थात् केवल देह के लालन-पोषण में लगे रहते हैं वे लोग घोर अन्धकार स्वरूप कूकर आदिक योनि में मरकर जन्म लेते हैं और जो लोग ‘संभूति’ आत्मा की केवल उपासना करते हैं अर्थात् वाचिक आत्मज्ञान के द्वारा वर्णाश्रमोचित कर्म को त्यागकर स्वेच्छानुसार शास्त्र विरुद्ध आचरण करते हैं वे लोक मरकर अत्यन्त  गाढ अन्धकारतम कीटादि क्षुद्र योनि में जन्म लेते हैं।

इस श्रुति का विशेष अर्थ जिसको जानना हो वह मेरी बनाई हुई ‘श्रीवचनभूषण’ की ‘चिन्तामणि’ टीका का अवलोकन करे । ग्रंथ के विस्तार के भय से अधिक मैं नहीं लिखता हूँ । छान्दोग्योपनिषद् में लिखा है यद्यपि

‘एतमित्तः प्रेत्याभिसंभवितास्मि । (छा० अ० ३ ख० १४ श्रु० ४ )

इस शरीर से मरकर जाने पर मैं इसी परब्रह्म को प्राप्त होऊँगा ॥४॥

‘ब्रह्मलोकमभिसंभवामि । ( ० अ० ८ ख० १३ श्रु० १)

 मैं ब्रह्मलोक को प्राप्त होता हूँ ।॥ १॥

इस प्रमाण से ब्रह्म-प्राप्तिरूपा अनुभूति संभूति शब्द से कही गयी है । परन्तु इस प्रकरण में समाधिरूपा संभूति शब्द से प्रतिपादन किया गया है। ईशोपनिषद् को बारहवीं श्रुति का अर्थ मूर्ति पूजा के खण्डनपरव कई जनों ने किया है । परन्तु वह अर्थ श्रुति के विरूद्ध होने सें अनादरणीय है| मूर्ति पूजा के विषय में भक्तों के आनन्द के लिये कुछ प्रमाण यहाँ पर मैं लिखता है कृपया प्रपन्न जन अवलोकन करें।

सहस्र्य प्रतिमा असि (शुक्ल य० अ० १५ म० ६५)

हे नारायण आप हजारों को मूर्ति हैं ॥६५||

प्रतिमा असि (कृष्ण यजु० तैत्तिरीयारण्यक प्रपाठक ४ अनुवाक ५)

आप मूर्ति हैं ॥ ५ ॥

‘संवत्सरस्य प्रतिमायां त्वा रात्र्युपास्महे ।‘ ( अथर्व वे० काण्ड ३ सू० १० ० ३ )

हे नारायण आप संवत्सर की मूर्ति हो जिस आपकी हम उपासना करते हैं ॥३॥

‘आत्मनो ह्येतं प्रति मामसृजत ।(शतपथ ११|१|६॥१३ )

नारायण ने अपनी मूर्ति को उत्पन्न किया ॥ १३ ॥

अथैतमात्मनः प्रतिमामसृजत यद्यज्ञं तस्मादाहुः प्रजापतिर्यज्ञः । (शत ११॥१|८|३ )

नारायण ने अपनी यज्ञनाम की मूर्ति उत्पन्न की इससे कहते हैं कि नारायण यज्ञ स्वरूप है ॥३॥

‘कासीत्प्रमा प्रतिमा किं निदानमाज्यं किमासीत्परिधिः क आसीत् ।

छन्दः किमासीत् प्रउगं किमुक्थं यद्देवा देव मयजन्त विश्वे ॥ (ऋग्वेद ० अ० ८ अ० ७ व० १८ ०३ )

कासीत्प्रमा प्रतिमा किं निदानमाज्यं किमासीत्परिधिः क आसीत् ।

छन्दः किमासीत् प्रउगं किमुक्थं यद्देवा देवमयजन्त विश्वे ॥ (ऋग्वेद ० अ० ८ अ० ७ व० १८ ०३)

सब की यथार्थ ज्ञान बुद्धि कौन है, मूर्ति कौन है, सबका कारण कौन है, घृत के समान सार जानने योग्य कौन है, सब दुःखों की निवृत्ति कारक और आनन्दयुक्त प्रीति का पात्र परिधि सीमा कौन है, इस जगत् का आवरण कौन है, स्वतंत्र वस्तु और स्तुति करने योग्य कौन है ?

यहाँ तक इस मंत्र में प्रश्न है और अन्त में सबका उत्तर यह है कि जिस नारायण की सब ब्रह्मादिक देवता पूजा किये हैं ॥३॥

अर्चत प्रार्चत प्रियमेधासो अर्चत ।

अर्चन्तु पुत्रका उत पुरं न धृष्वर्चत ॥‘ (ऋ० अष्ट० ६ अ ०५ सू०५८ म ०८)

हे प्रियमेधावाले तुम नारायण का पूजन करो, विशेषरूप से पूजा करो, तुम अर्चना करो। हे पुत्रो तुम सब पूजा करो। जैसे धर्षणशील को पूजते हैं वैसे तुम अर्चावतार की पूजा करो॥८॥

अदो यद्दारु प्लवते सिन्धोः पारे अपूरुषम् । 

तदा भस्त्र दुर्हणोऽनेन गच्छ परस्तरम् ॥ (ऋ अ० ८ अ० ८ सू० १३ म० ३)

विप्रकृष्ट देश में वर्तमान पुरुष निर्मणरहित जो दारुमय पुरुषोत्तम शरीर समुद्र के तट पर वर्तमान है उस दारु ब्रह्म की उपासना करो जो किसी से भी हनन नहीं होता है। उस दारुमय जगन्नाथ की उपासना करने से त्रिपाद विभूति को प्राप्त कर लो।

स्नात्वा शुचौ गोमयेनोपलिप्य प्रतिकृति ।

कृत्वा अक्षतपुष्पैर्यथालाभमर्चयेत् ॥‘ ( बौधायनकल्प० परिचर्याप्रकर० सू० २ )

स्नान के पवित्र देश में गोवर से लिपी भूमि में देवता की मूर्ति बनाकर अक्षत पुष्प से पूजे ।। २ ॥

‘देवी द्यावापृथिवी मखस्य तवामद्य शिरो राध्यासं देवयजने ।

पृथिव्या मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्षणे ॥ ( यजु० अ० ३७ मं० ३ )

हे मिट्टी जल रूप देवियो अब देवयजन स्थान में तुम दोनों को लेकर महावीर की मूर्ति को बनाऊँगा इसलिये यज्ञ के हेतु ग्रहण करता हूँ ॥ ३ ॥

‘एह्यश्मानमातिष्ठाश्मा भवतु ते तनु: ।

कृण्वन्तु विश्वे देवा आयुष्टे शरदः शतम् ॥ (अथर्व०२॥४॥)

हे श्रीमन्नारायण पाषाण की मूर्ति में विराजमान हो जाइये, पाषाण की मूर्ति आपका शरीर हो । सब देवता इस आपके शरीर की आयु अनन्त वर्षों की करें ४॥

इन प्रमाणों से स्पष्ट मूर्तिपूजा सिद्ध होती है । ईशावास्योपनिषद् की बारहवीं श्रुति शुद्ध यजुर्वेद ( अ० ४० म० ६) में भी है ॥ १२ ॥

 

अडियेन माधव श्रीनिवास रामानुज दास

Published by ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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