ईशोपनिषद्. 9

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद् वरवरमुनये नमः

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।

ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ॥९॥

पदविभाग

अन्धम् तमः प्रविशन्ति ये अविद्याम् उपासते ततः भूयः इव ते तमः ये उ विद्यायाम् रताः

अन्वयार्थ-

( ये ) जो भोगैश्वर्यप्रसक्त मनुष्य ( अविद्याम् ) विद्यासे भिन्न केवल कर्म मात्र को ( उपासते ) अनुष्ठान करते हैं, वे ( अन्धम् ) अतिगाद (तमः) अन्धकार को ( प्रविशन्ति ) प्रवेश करते हैं (ये) और जो लोग () निश्चय करके ( विद्यायाम् ) स्वाधिकारोचित कर्म परित्याग करके विद्यामें ( रताः) तत्पर रहते हैं ( ते ) वे विद्यारत ( ततः) उस कर्ममात्रनिष्ठ से प्राप्य गम्भीर अन्धकार से ( भूयः ) अधिकतरके ( इव ) समान ( तमः ) अन्धकार को प्राप्त होते हैं ॥४॥

विशेषार्थ-

जो भोग तथा ऐश्वर्य में प्रसक्त हैं वे लोग केवल इष्टापूर्तादिक कर्म को करके अन्धतामिश्र नरक में या शूकर कूकर आदि योनिमें प्रवेश करते हैं।

मुण्डकोपनिषद् में लिखा है

प्लावाह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म ।

एतच्छ्रे यो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्यं ते पुनरेवापियन्ति ।। ( मुंडक ० मुण्डक १ खण्ड २ श्रु०७ )

‘इष्टापूर्त मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्तो प्रमूढाः ।

नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥१०॥

निश्चय यह अठारह यज्ञ रूप डोंगे दृढ़ नहीं है जिनमें अश्रेष्ठ कर्म कहा है। जो मूढ इसको कल्याणरूप है ऐसा मानकर प्रशंसा करते हैं वह फिर भी बुढापे और मरणको प्राप्त होते हैं ॥७॥

इष्ट और पूर्तको श्रेष्ठ मानते हुए परम मूढ दूसरे श्रेय को नहीं जानते हैं वे शुभकर्म से प्राप्त हुए स्वर्गके ऊपर भोग कर इस लोकको या इससे भी हीन लोक को प्रवेश करते हैं ॥१०॥

और जो लोग अपने वर्णाश्रमोचित कर्म का परित्याग करके विद्या में तत्पर रहते हैं वे लोग कर्ममात्रनिष्ठ से प्राप्य अतिगाढ़ अन्धकार से भी अधिकतर अन्धकार को अर्थात् मल-मूत्र की कृमियोनि को प्राप्त करते हैं।

लिखा है:-

अथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह

यत्ते कपूयां योनिमापोरन् श्वयोनिं वा

शूकरयोनिं वा चाण्डालयोनिं वा । (छा० अ० प्रापा० ५ खं० १० श्री ० ७ )

अथतयोः पथोर्न कतरेण च न तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदा वर्तीनि

भूतानि भवन्ति जायस्व त्रियस्वेत्येततृतीयं स्थानम् ॥८॥

जो अशुभ आचरणवाले होते हैं वे तत्काल अशुभयोनि को प्राप्त होते हैं, कूकर की योनि, शूकरयोनि अथवा चाण्डालयोनि को प्रात होते हैं I७॥ इनमें से वे किसी मार्ग द्वारा नहीं जाते, वे ये क्षुद्र और बारबार आने जाने वाले प्राणी होते हैं उत्पन्न होओ और मरो यह उनका तृतीय स्थान होता है ।

ईशोपनिषद् की नवमी श्रुति शुक्ल यजुर्वेद ( अ० ४० म० १२) में और बृहदारण्यक (अ० ४ ब्राह्म ४ श्रु० १०) में भी है।

अडियेन माधव श्रीनिवास रामानुज दास

Published by ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

2 thoughts on “ईशोपनिषद्. 9

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: