ईशोपनिषद् .7

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद् वरवरमुनये नमः

यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः ।

तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥

पदविभाग

यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मा एव अभूत् विजानतः तत्र क: मोह: कः शोक एकत्वम् अनुपश्यतः

अन्वयार्थ-

( यस्मिन् ) जिस प्रणिधान समय में (विजानतः ) परब्रह्म नारायण को भली भाँति जाननेवाले प्रपन्न पुरुष के ( सर्वाणि ) समस्त ब्रह्मादिस्तम्ब पर्यंत ( भूतानि) भूत (आत्मा) आत्मा (एव) निश्चय करके ( अभूत् ) हो जाता है ( तत्र) उस समय में (एकत्वम् ) एकता को (अनुपश्यतः) निरन्तर देखनेवाले भक्त के (मोह:) मोह स्वतन्त्रादिलक्षण (क:) कौन सा होता है और ( शोक ) पुत्रादिमरण में शोक (कः) कौन सा होता है ॥७॥

 

विशेषार्थ –

जिस प्रणिधान समय में ईशावास्योपनिषद् की पहली श्रुति से लेकर आठवीं श्रुति पर्यन्त प्रतिपादित स्वतंत्र वस्तु भेद को विचार कर परब्रह्म नारायण को जाननेवाले ज्ञानी पुरुष के ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्त समस्त प्राणी आत्मा ही हो जाते हैं अर्थात् सर्वभूत शारीरिक परब्रह्म नारायण प्रतीत हो जाता है। उस आदि प्रणिधान समय में स्वतंत्र तथा भ्रमादि लक्षण मोह नहीं हो सकता है और सब वस्तु को परमात्मा की विभूति जान लेने पर पुत्रादिमरण तथा राज्यादिहरण होने पर भी शोक नहीं हो सकता है। इस श्रुति में समस्त जड़चेतनस्वरूप जगत् परब्रह्म नारायण का शरीर है। यह सामानाधिकरण्य वाक्य से प्रतिपादन किया गया है।

बृहदारण्यकोपनिषद् में लिखा है

‘यस्य पृथिवी शरीरम् ॥ ‘यस्याप: शरीरम् ॥४॥ यस्याग्निः शरीरम् ॥४॥ यस्यान्तरिक्षं शरीरम् ॥६॥ यस्य वायुः शरीरम् ॥७॥ यस्य द्यौः शरीरम् ॥८॥ यस्यादित्यः शरीरम् ॥ह॥ यस्य दिशः शरीरम् ॥१०॥ यस्य चन्द्र तारकं शरीरम् ॥११॥ यस्याकाशः शरीरम् ॥१२॥ यस्य तमः शरीरम् ॥१३॥ यस्य तेजः शरीस्म् ॥१४ यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरम् ॥१५॥ यस्य प्राणः शरीरम् ॥१६॥ यस्य वाक् शरीरम् ॥१७॥ यस्य चक्षुः शरीरम् ॥१८॥ यस्य श्रोत्रं शरीरम् ॥ १६॥ यस्य मनः शरीरम् ॥२०॥ यस्य त्वक् शरीरम् ॥२१॥ यस्य विज्ञान शरीरम् ।।२२।। यस्य रेतः शरीरम् ॥२३॥ (बृह ० अ० ३ ब्रा० ७ श्रु० ३ )

जिस परब्रह्म नारायण का पृथ्वी शरीर है ॥३॥ जिसका जल शरीर है ॥४ जिसका अग्नि शरीर है॥५|| जिसका अन्तरिक्ष शरीर है |६॥ जिसका वायु शरीर है ||७|| जिसका दिवलोक शरीर है ॥८॥ जिसका आदित्य शरीर है ॥९॥ जिसका दिशा शरीर है ॥१०॥ जिसका चन्द्रमा औरा तारा शरीर है ॥११॥ जिसका आकाश शरीर है॥१२|| जिसका तम शरीर है ॥१३|| जिसका तेज शरीर है॥१४|| जिसका सब भूत शरीर है॥१५॥ जिसका प्राण शरीर है ॥१६॥ जिसकी वाणी शरीर है|१७|| जिसका नेत्र शरीर है॥१८॥ जिसका श्रोत्र शरीर है ॥१६॥ जिसका मन शरीर है॥२०॥ जिसका त्वक् शरीर है||२१॥  जिसका विज्ञान-आत्मा शरीर है ॥२२॥ जिस नारायण का वीर्य शरीर है | २३॥

और सुबालोपनिषद् में भी लिखा है है

‘यस्य पृथिवी शरीरम् ॥ यस्यापः शरीरम् ॥ यस्य तेजः शरीरम् ॥ यस्य वायुः शरीरम् ।। यस्याकाशः शरीरम् ।। यस्य मनः शरीरम् ॥ यस्य बुद्धिः शरीरम् ॥ यस्याहङ्कारः शरीरम् ॥ यस्य चित्तं शरीरम् ॥ यस्याव्यक्त शरीरम् ॥ यस्याक्षरं शरीरम् ॥ यस्य मृत्युः शरीरम् ॥ (सुबा० खं० ७)

जिसे परब्रह्म नारायण का पृथ्वी शरीर है। जिसका जल शरीर है। जिसका तेज शरीर है । जिसका वायु शरीर है। बुद्धि शरीर है। जिसका आकाश शरीर है। जिसका अहङ्कार शरीर है। जिसका चित्त शरीर है। जिसका अव्यक्त शरीर है। जिस नारायण का अक्षर जीवात्मा शरीर है। जिसका मृत्यु शरीर है।॥ ७॥

 

‘जगत्सर्वं शरीरं ते । (वाल्मीकि रामा युद्ध ०६ सर्ग ० १२१)

समस्त संसार आपका शरीर है ॥१२१।।

इस श्रुति में ‘देवोऽहम्’ ‘मनुष्योऽहम्’ यहाँ पर जैसे शरीरात्मभाव सम्बन्ध माना जाता है, वैसे ही शरीरात्मभाव सम्बन्ध से ही जगत् और ब्रह्मका सामानाधिकरण्य वैदिक जन मानते हैं । ईशोपनिषद् की सातवीं श्रुते शुक्ल यजुर्वेद ( अ० ४० मं० ७ ) में भी है ॥७॥

अडियेन माधव श्रीनिवास रामानुज दास

Published by ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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