ईशोपनिषद् .6

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद् वरवरमुनये नमः

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।

सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥६॥

पदविभाग

य: तु सर्वाणि भूतानि आत्मनि एव अनुपश्यति सर्वभूतेषु च आत्मानम् ततः न विजुगुप्सते

अन्वयार्थ –

(तु ) परन्तु ( य: ) जो मुमुक्षु पुरुष ( सर्वाणि ) ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त ( भूतानि ) भूतों को ( आत्मनि ) परब्रह्म नारायण में () और ( सर्वभूतेषु ) समस्त प्राणियों में (आत्मानम् ) परब्रह्म नारायण को ( एव) निश्चय करके (अनुपश्यति) निरन्तर देखता है (ततः) उस कारण से () नहीं (विजुगुप्सते) किसी से घृणा करता है अथवा निन्दा करता है।॥६॥

विशेषार्थ-

भगवद्विषयाधिकृत मुमुक्षु पुरुष जो है वह ब्रह्मादि स्तम्भ पर्यन्त समस्त प्राणियों को सर्वाधार परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा में देखता है और सर्वान्तर्यामी परमात्मा को निश्चय करके समस्त भूतों में देखता है। उस कारण से किसी की निन्दा नहीं करता है अथवा किसी से घृणा नहीं करता ।

श्रीमद्भगवद्गीता में भी लिखा है

‘सर्वभृतस्थमास्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।

ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥’ ( गीता ० अ० ६ श्लोक २६ )

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति |

तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥३०॥

योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदृष्टिसम्पन्न पुरुष सब भूतों में आत्मा को और सब भूतों को आत्मा में स्थित देखता है ॥१६|

जो सर्वत्र मुझ परमात्मा को और सबको मुझ परमात्मा में देखता है उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता है ॥३०॥

ईशावास्योपनिषद् की छठवीं भक्ति शुक्लयजुर्वेद (अ० ४० म० ६) में भी परन्तु संहिता में भूतान्यात्मन्नेवानुपश्यति’ और ‘विचिकित्सति’ ऐसा पाठभेद है | ६॥

अडियेन माधव श्रीनिवास रामानुज दास

Published by ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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