ईशोपनिषद् . 3

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद् वरवरमुनये नमः

असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः ।

तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥३॥

 

पदविभाग:

असुर्याः नाम ते लोकाः अन्धेन तमसा आवृताः तान् ते प्रेत्य अभिगच्छन्ति ये के च आत्महनः जनाः

अन्वयार्थ

( असुर्याः ) असुरों के निवास भूत अतिदारुण ( नाम) शास्त्र-प्रसिद्ध ( अन्धेन ) अतिगाढ ( तमसा ) अन्धकार से ( आवृताः ) ढके हुए (ते) वे (लोकाः) नरक लोक हैं (ये) जो (के) कोई () भी (आत्महनः) आत्मा की हत्या करनेवाले (जनाः) मनुष्य हैं (ते) वे सब प्राण-पोषण में तत्पर (प्रेत्य) इस शरीर का त्याग कर ( तान् ) उन भयर रौरवादि लोकों को ( अभिगच्छन्ति ) बार बार प्राप्त होते हैं ॥३॥

 

विशेषार्थ

जो केवल प्राणों के पोषण में तत्पर रहते हैं वे असुर है । ऐसे असुरों के निवास स्थान अतिदारुण नरक नाम से गरुड़ादिक महापुराणों में प्रसिद्ध हैं । जो लोक अतिगाढ अन्धकार से अच्छादित हैं । जो कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि आत्महत्या करनेवाले हैं अर्थात् आत्मा को नहीं जाननेवाले हैं । तैत्तिरीयो पनिषद् में लिखा है

 ‘असन्नेव स भवति । असद्ब्रह्मेति वेद चेत् ॥’ (तैत्तिरी० आनन्दवल्ली १ अनुवाक ६)

जो ब्रह्म नहीं है ऐसा जानता है वह सत्ता शून्य ही हो जाता है ॥६॥

परब्रह्म नारायण को नहीं जाननेवाले मर करके कूकर शूकर आदि योनियो में या रौरवादि लोकों में बार बार जाकर अत्यन्त दुःख भोगते हैं। शास्त्र में एक असुरयोनि का भी वर्णन है

‘ये रूपाणि प्रतिमुश्चमाना असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति ।

परापुरो निपुरो ये भरन्त्यग्निष्टांल्लोकात.णुदात्यस्मात् ॥’( यजु वे० अ० २ ० ३० )

पितरों का अन्न श्राद्ध में भक्षण करने की इच्छा से अपने रूपों को पितरों के समान करते हुए जो असुर पितृ स्थान में विचरते हैं तथा जो असुर स्थूल और सूक्ष्म देहों को अपना अपना असुरत्व छिपाने के लिये धारण करते हैं उल्मुकरूप अग्नि उन असुरों को इस पितृ यज्ञ स्थान से हटा दें ॥३०॥

यक्षरक्षःपिशाचांश्च गन्धर्वाप्सरसोऽसुरान् ।

नागान्सर्पांसुपर्णाश्च पितृणां च पृथग्गणान् । (मनु ० अध्याय ० १ श्लोक ० ३७ )

यक्ष, राक्षस, पिशाच, गन्धर्व, अप्सरा, असुर, नाग, सर्प, गरुड और पितृगण को भी प्रजापति ने उत्पन्न किया ॥३७॥

 

‘भूतविद्या नाम देवासुरगन्धर्वयक्षरक्ष: पितृपिशाचनागग्रहाद्युपसृष्टचेतसां शान्तिकर्म बलिहरणादि ग्रहोपशमनार्थम्।’ (सुश्रुत सूत्रस्थान ११)

भूत विद्या नाम से प्रसिद्ध यह है कि देव, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितर, पिशाच, नाग आदि ग्रहों करके व्याप्तचित्तवाले पुरुषों की गृहशान्ति करने के लिये शान्तिकर्म बलिप्रदान आदिक है ॥११॥

 

इन प्रमाणों से सष्ट असुरयोनि सिद्ध होती है। अब यहां पर यह प्रश्न होता है कि नरक है इसमें क्या प्रमाण है। इसका उत्तर यह लिखा है

 

‘भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात् ।’ (योगशा० अध्या० १ पाद ३ सू०२४)

‘तस्य प्रस्तारः सप्तलोकास्तत्रावीचे: प्रभृति मेरुपृष्ठ यावदित्येवं भूर्लोको मेरुपृष्ठ दारभ्याध्रुवात् गृह नक्षत्र ताराविचित्रोऽन्तरिक्षलोकस्ततः परः स्वर्लोकः पञ्चविधो माहेन्द्रस्तृतीयलोकश्चतुर्थः प्राजापत्यो महर्लोकस्त्रिविधो ब्राह्म:, तद्यथा जनलोकस्तपोलोकः सत्यलोक इति । ब्रह्मस्त्रिभूमिको लोकः प्रजापत्यस्ततो महान् । माहेन्द्रश्च स्वरित्युक्तो दिवि तारा भुवि प्रजाः॥’ (व्यासभाष्य)

सूर्य में संयम करने से भुवन का ज्ञान होता है ॥२४॥ उस भुवन का विस्तार सात लोक है। अवीचि नाम के स्थल से लेकर सुमेरु पर्वत की पीठ तक भूलोक है १ और सुमेरु की पीठ से लेकर ध्रुव पर्यंत नक्षत्र तारा आदिकों से सुशोभित अन्तरिक्ष लोक है २ तथा उससे परे पाँच प्रकार के स्वर्गलोक हैं ३ और तृतीय माहेन्द्रलोक है तथा प्रजापति का चौथा महलोंक है ४ और तीन प्रकार के ब्रह्मलोक है जनलोक ५, तपोलोक ६ और सत्यलोक ७॥

‘ततो महातलरसातलातलसुतलवितलतलातलपातालाख्यानि सप्त।’ (व्यासभाष्य)

इसके बाद नीचे महातल १, रखा २, अतल ३, सुतल ४, वितल ५, तलातल ६ और पाताल ७ ये सात लोक है ।

‘तत्रावीचेरुपयुं परिनिविष्टाः षण्महानरकभूमयोधनसलिलानलानिला काशतमःप्रतिष्ठाः महाकालाम्वरीपरौरवमहारौरवकालसूत्रान्धतामिस्राः। यत्र खकर्मोपार्जितदुःखवेदनाःप्राणिनः कष्टमायुर्दीर्षमा्षिप्य जायन्ते ।’ (व्यासभाध्य)

 

वहां पर अवीची नाम के स्थल से ऊपर ऊपर रचित छ: महानरक स्थान हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा अन्धकार में प्रतिष्टित हैं । महाकाल १, अम्बरीष २, रौरव ३, महारौरव ४, कामसूत्र ५, अन्धतामिस्र ६ ये उनके नाम हैं । जिन स्थानों में अपने कर्मजन्य दुःख-वेदनायुक्त प्राणी कष्टरूप दीर्घायु को प्राप्त होकर जन्म लेते हैं।

इससे सिद्ध होता है कि नरक एक कोई पृथक् स्थान है। श्रीमद्भगवद्गीता में लिखा है—

‘संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।

पतन्ति पितरो ह्येषां लूम पिण्डोदक क्रियाः॥’ (गीता अ० १ श्लोक ० ४१)

‘उत्कल धर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।

नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुमः॥४४||

वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में डालने वाला होता है। अतः उनके कुल में पिण्ड और जलदान की क्रिया लुप्त हो जाने के कारण उनके पितरों का नरक में पतन होता है ॥४२। हे जनार्दन, जिनके कुलधर्म नष्ट हो चुके हैं उन मनुष्यों का अवश्य ही नरक में निवास होता है ऐसा हमने सुना है ॥४४॥

‘अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।

प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेशुचौ ॥’ (गीता अ० १६ श्लोक १६)

‘त्रिविधं नरकस्य एक द्वारं नाशनमात्मनः।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत् ॥२१॥

अनेक संकटों से जिनका चित्त अत्यन्त भ्रमित है ऐसे मोह जाल से घिरे हुए, भोगों के उपभोग में कैसे हुए मनुष्य घोर नरक में गिरते हैं । १६ ।। काम, क्रोध और लोभ ये तीन नरक के द्वार आत्मा का पतन करने वाले हैं। तीनों का त्याग कर देना चाहिये ॥२१॥

 

स्याचारकस्तु नरको निरयो दुर्गतिः स्त्रियाम् ।

तद्भदा:-तपनावीचिमहारौरवरौरवाः ॥ (अमरको० काण्ड १ वर्ग ६ श्री ० १ )

संघात: कालसूत्रं चेत्याद्या: सत्त्वास्तु नारकः ।

प्रेता वैतरणी सिन्धुः स्यादलक्ष्मीस्तु निर्ऋतिः॥ २॥

नारक १, नरक २, निरय ३, दुर्मति । ये चार नाम नरक के है इनमें दुर्मति शब्द सीलिंग में होता है। उस नरक के भेद-तपन १, अवीचि २, महारौरव ३ और रौरव ४ ॥ १॥ संघात ५, कालसूत्र ६ इत्यादिक है। होने वाले प्राणी प्रेतसंज्ञक हैं। की शोभा निऋति संज्क है ॥२॥ नरक की नदी वैतरणीसंज्ञक है और नरक की अशोभा निर्ऋतिसंज्ञक है।

 

‘नरके पच्यमाने तु यमेन परिभाषितः ।

किं त्वया नार्चितो देवः केशवः क्लेश नाशन ।’ ( पाण्डवगीता )

नरक में पकते हुए पुरुष से यमराज ने कहा कि तुमने क्लेशनाश करनेवाले केशव भगवान् का पूजन क्या नहीं किया॥

इन प्रमाणों से स्पष्ट नरक ज्ञात होता है। ग्रंथ के विस्तार के भय से अधिक मैं नहीं लिखता हूँ। जिसको अधिक जानना हो वह गरुड़ पुराण आदि का अवलोकन करे।

ईशावास्योपनिषद की तीसरी श्रुति शुक्ल यजुर्वेद ( अ० ४ म० ३ ) में भी है परन्तु संहिता में ‘”प्रेत्यापि” ऐसा पाठभेद है॥३॥

अडियेन माधव श्रीनिवास रामानुज दास

Published by ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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