ईशोपनिषद्. 2

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।

एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥२॥

पदविभाग

कुर्वन् एव इह कर्माणि जिजीविषेत् शतम् समाः एवम् त्वयि न अन्यथा इतः अस्ति न  कर्म लिप्यते नरे

अन्वयार्थ-

( इह ) इस लोक में ( कर्माणि ) नित्य नैमित्तिक आदि निष्काम कर्मों को ( कुर्वन् ) करता हुआ (एव) ही ( शतम् ) सौ (समाः) वर्ष (जिजीविषेत् ) जीने की इच्छा करें ( एवम् ) इस प्रकार ( त्वयि ) तुझ ( नरे ) मनुष्य में ( कर्म ) कर्म () नहीं ( लिप्यते ) संलग्न होता है (इतः) इससे (अन्यथा) प्रकारान्तर () नहीं (अस्ति) है ॥२॥

विशेषार्थ-

इस कर्मभूमि भूगोल में सन्ध्यावन्दनादि विहित विद्याङ्ग कर्मों को करते हुए सौ वर्षपर्यन्त जीवित रहने की इच्छा करे, क्योंकि श्रुति कहती है

शतायुर्वै: पुरुष:’

सौ वर्ष की आयुवाला ही पुरुष है ।

यजुर्वेद में भी लिखा है

‘पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं शृणुयाम शरदः शतं

प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतम् ॥ (यजुर्वेद ० अ०३६ म० २४)

हम सौ वर्ष तक भगवान को देखें तथा सौ वर्ष पर्यन्त जीते रहें और सौ वर्ष तक भगवच्चरित्रों को सुनें तथा सौ वर्ष तक भगवच्चरित्रों का कथन करें और सौ वर्ष पर्यन्त हम अदीन रहें ॥ २४ ॥

 

श्रीमद्भागवत गीता में लिखा है

‘स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ॥४॥ (गीता अ० १८ श्लोक ४५-४६)

‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥४६॥

अपने अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य परमपद की प्राप्तिरूप संसिद्धि को पाता है ।४५॥ अपने कर्म से उस परमात्मा को पूजकर मनुष्य सिद्धि को पाता है । ४६॥  तुम्हारे लिए आसक्ति तथा फल का त्यागकर कर्म करना ही श्रेष्ठ मार्ग है। इस प्रकार से कर्म करने के अतिरिक्त और कोई ऐसा मार्ग नहीं कि जिसके द्वारा कर्म का लोप न हो और सहज में परमपद प्राप्त हो ।

यहाँ पर यह प्रश्न होता है कि कर्मविधि विद्वत् विषयक नहीं है ।

इसका उत्तर छान्दोग्योपनिषद् में लिखा है कि परम ज्ञानी अश्वपति केकय ने उन महर्षियों से कहा है

‘यक्ष्यमाणो हवै भगवन्तोऽहमस्मि ।’ (छान्दो० ० अध्याय ० ५ खण्ड ११ रु० ५)

ऐ भगवान महर्षियों, मैं निश्चय कर के यज्ञ करने वाला हूँ ॥

और ब्रह्मवेत्ताओं में अग्रगण्य जनक राजा के विषय में भी लिखा है ॥

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ॥‘ (गीता अ० ३ श्लोक ० २०)

ज्ञानियों में अग्रगण्य जनकादि राजर्षि भी धर्म के आचरण से ही मुक्ति को प्राप्त हुए ॥ २०॥

 

महाभाष्य में लिखा है ‘

यणिस्तर्वाणो नाम ऋषयो बभूवुः प्रत्यक्षवर्माणः परापरज्ञाः विदित वेदितव्या अधिगतयाथातथ्याः। ते तत्रभवन्तो यद्वानस्तद्वान इति प्रयोक्तव्ये यणिस्तर्वाण इति प्रयुञ्जते याज्ञे पुनः कर्मणि नापभाषन्ते।’ (महाभाष्य अध्या० १ पाद १ आह्निक १)

‘यज्ञे पुनरिति । अनेन तत्त्व ज्ञानिनामपि कर्माधिकार सूचयति ॥’ (उद्योत)

इन प्रमाणों से स्पष्ट ज्ञात होता है कि तत्वज्ञानियों का कर्म में अधिकार है । इससे कर्म विधि विद्वद्विषयक है । श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार

भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ (गीता अ० ८ श्लो० ३)

भूतों के भाव को उत्पन्न करनेवाले विसर्ग का नाम कर्म है ।

ईशोपनिषद् की दूसरी श्रुति शुक्लयजुर्वेद (अ० ४० मं० २ ) में भी है। यतीन्द्र श्रीमद् रामानुजाचार्य ने ‘नियमात् । ( शारीरक मे० अ० ३ प० ४ सू० ७ ) और ‘नाविशेषात् ।‘ (शारीर कभी अ० ३ पाद ४ सू० १३ ) के भाष्य में ईशावास्योपनिषद् की दूसरी श्रुति के पूर्व को उद्धू त किया है तथा ज्ञानियों के कर्माचरण को देखकर ही महर्षि वादरायणाचार्य ने ‘आचारदर्शनात्’ । (शारीर कभी अ० ३ पाद ४ सू० ३ ) का निर्माण किया है ॥२॥

अडियेन माधव श्रीनिवास रामानुज दास

Published by ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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