ईशोपनिषद्. 1

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद् वरवरमुनये नमः

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥१॥

पदविभाग:

ईशा वास्यम् इदम् सर्वम् किम् च जगत्याम् जगत् तेन त्यक्तन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्य स्वित् धनम् 

अन्वयार्थ-

(जगत्याम् ) अखिल ब्रह्माण्ड में ( यत् ) जो ( किं+च ) कुछ भी ( जगत् ) स्थावर जंगमस्वरुप संसार है ( इदम् ) ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्त यह ( सर्वम् ) भोक्तृ भोग्यरूप सब जगत् (ईशा ) सर्वेश्वर परब्रह्म नारायण से ( वास्यम् ) व्याप्त है (तेन) भोग्यता भ्रमविषयक उस समस्त जगत् करके (त्यक्तन) अपनेपन के संबन्ध को त्याग कर ( भुञ्जीथाः) सम्पूर्ण हेयगुणगणों से रहित एकतान श्रीलक्ष्मीनाथजी को भोगते रहो ( कस्य ) किसी के (स्वित् ) भी ( धनम् ) धन की (मा) मत ( गृधः ) अभिलाषा करो ॥ १॥

विशेषार्थ-

मुमुक्षुओं के प्रति माता-पिता से भी अधिक कल्याण चाहनेवाली श्रुति आदेश देती है कि अखिल विश्व ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी जड चेतनात्मक जगत् है, यह ब्रह्मा से स्तम्बपर्यन्त समस्त भोक्ता भोग्य स्वरूप, सर्वाधार सर्वनियन्ता, सर्वाधिपति, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वकल्याणगुणस्वरुप परब्रह्म श्रीमन् नारायण से व्याप्त है । महानारायणोपनिषद् में लिखा है

‘यच्च किंचित् जगत सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा।

अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः॥’ (महानारायण० १३।१)

जो कुछ देखने सुनने में जड़चेतन स्परूप जगत् है उसके भीतर और बाहर व्याप्त होकर परब्रह्म नारायण स्थित हैं ॥१॥

श्रीमद्भगवद्गीता में लिखा है

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ॥ (गीता अध्याय ६, श्लोक ४)

मुझ अव्यक्त मूर्ति यह समस्त जगत् व्याप्त है ।॥४॥

उस समस्त जगत् को दुःख- मूल, दुःखमिश्र, दुःखोदक, आदि समझकर आसक्ति तथा फल की कामना का त्याग कर अथवा लोकैषणा, वित्तैषणा और पुत्रैषणा को छोड़कर वात्सल्य,सौशल्य, सौलभ्य आदि दिव्यगुणविशिष्ट श्रीमन्नारायण का अनुभव करते रहो। महानारायणोपनिषद् में लिखा है

न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः । (महाना० १२/३ )

कुछ लोग कर्म से, प्रजा से और धन से नहीं किन्तु केवल त्याग से अमृत स्वरुप परब्रह्म नारायण को प्राप्त हुए ॥३॥

किसी बन्धु या शत्रु के धन या भोगने योग्य विषयों को भोगने की अभिकाङ्क्षा मत करो। अब यहाँ पर प्रश्न यह होता है कि ‘इश’ शब्द का अर्थ परब्रह्म नारायण कैसे होता है ? इसका उत्तर यह है

(मुण्डकोप० मुण्डक ३ खण्ड १ श्रुति २)

‘जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥’ 

‘यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्ण कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ॥३॥

जब भक्तों से नित्य सेवित अपने से भिन्न परब्रह्म नारायण को और उनकी महिमा को यह जीव देखता है तब शोक रहित हो जाता है ॥ २॥ जब द्रष्टा जीवात्मा ब्रह्मा के भी आदिकारण समस्त जगत् के रचयिता प्रकाश स्वरूप परमपुरुष प्रक्रिया नारायण को देखता है ||३||

‘व्यक्त व्यक्त करते विश्वमीशः ।’(श्वेताश्वतर अध्याय १ श्रु० ८)

‘ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशानीशौ ॥४॥

व्यक्त और अव्यक्त स्वरूप इस विश्व का परब्रह्म नारायण धारण और पोपण करते हैं । जीव और परब्रह्म ये दोनों अजन्मा है परन्तु परब्रह्म नारायण सर्वज्ञ और सर्व समर्थ हैं और जीव अज्ञानी तथा असमर्थ है ॥

‘विश्वस्यैकं परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वामृता भवन्ति ॥‘ (श्वे० अ० ३ श्रु०७)

सब विश्वको सब ओर से घेरे हुए उस एक परब्रह्म नारायण को जानकर प्रपन्न अमर हो जाते हैं ॥७॥

‘तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कार्य प्रसादये त्वामहमीशमीज्यम् ॥’ (गीता अ० ११ श्लो० ४४)

इसलिए में दण्डवत् प्रणाम करके स्तुति करने योग्य परब्रह्म नारायण आपको प्रसन्न करता हूँ ॥४४॥

 

इन प्रमाणों से तथा

श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ‘ (यजुर्वे० अध्या० ३१ मं० २२)

श्रीदेवी और भूदेवी आप नारायण की स्त्री हैं ॥ २२॥

 

इस श्रुति से श्रीपति नारायण के सिद्ध होने से परमैश्वर्ययुक्त परब्रह्म श्रीकांत का ही वाचक ईश’ शब्द है । क्योंकि अदादि पठित ‘ईश ऐश्वर्ये’ इस धातु से ईश शब्द निष्पन्न होता है।

‘शुद्धो देव एको नारायणो न द्वितीयोऽस्ति कश्चित् ।‘ (नारायणोपनि० २०२)

शुद्ध देव एक परब्रह्म नारायण है, दूसरा कोई नहीं है।

इन पूर्वोक्त प्रमाणों से तथा जगत्कारणवादिनी श्रुतियों के यथार्थ विवेचन करने से ‘ईश’ शब्द का अर्थ परब्रह्म नारायण होता है। यहां पर ‘सर्वम्’ पद से भोक्ता तथा ‘जगत् पद से भोग्य और ‘ईशा’ पद से प्रेरिता का निर्देश करके

‘भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा ।’ (श्वे० अ०१ श्रु०१२)

भोक्ता, भोग्य और प्रेरिता इन तीनों को जानकर ॥१२॥

इस श्रुति में प्रतिपादित तत्वत्रय अनादि वाद कहा गया है। और व्याप्यव्यापकभाव का प्रतिपादन करके

तिलेषु तैलं दधनीव सप्रापः स्रोतःस्सरणीषु चाग्निः ॥’ (श्वे० अ० १ श्री ० १५)

तिल में तेल, दही में घी, स्रोतों में जल और अरणियों में अग्नि जैसे रहती है ।वैसे ही चराचर में व्याप्त परमात्मा है।

इस श्रुति के अनुसार व्यापक परब्रह्म नारायण साकार प्रतिपादित किये गये है। शुक्लयजुर्वेद संहिता (अ०४ मं०१) में भी प्रस्तुत श्रुति है । श्रीशेषावतार भगवद् रामानुजाचार्य ने

‘स्तुतयेऽनुमतिर्वा । (शारीरिक मीमांसा ०३ ०४ सू०१४)

के श्रीभाष्य में ईशावास्योपनिषद् की पहली श्रुति का पहला पाद उद्धृत करके ‘ईशावास्य विद्या’ के अत्युत्तम माहात्म्य प्रतिपादन किया है।

 

अडियेन माधव श्रीनिवास रामानुज दास

Published by ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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